दुष्यंत कुमार की 6 बेहतरीन ग़ज़लें – Best Gazals Of Dushyant Kumar

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दुष्यंत कुमार गजल, dushyant kumar best gazal in hindi

 

Dushyant Kumar Top 6 Gazalas

दुष्यंत कुमार की 6 बेहतरीन ग़ज़लें


दुष्यंत कुमार, देश का एक ऐसा कवि, ऐसा शायर , ऐसा ग़ज़लकार ,
जिसने ७० के दशक में अपनी कलम से देश में कुशासन के खिलाफ एक जन आंदोलन खड़ा कर दिया था |
एक ऐसी क्रान्ति ला दी थी जिसने तत्कालीन सरकार के शासन की नींव तक हिला कर रख दी, उनके मन का आक्रोश जो एक ओर कलम के जरिए बाहर आ रहा था तो दूसरी ओर लोगों के मन में कुसत्ता पक्ष के प्रति विद्रोह की भावना को बढ़ा रहा था – उनका मानना था जिस सरकार पर देश के जन विकास का दायित्व है आज वो ही लोगों का शोषण करने में लगी हुई है।
 
इसलिए इसके खिलाफ आवाज उठाई जानी चाहिए और उन्होंने उठाई भी साथ में लोगों को भी जागरूक किया , वे मानते थे कि अगर अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाई गयी तो ये अन्याय बढ़ता ही जाएगा, और साथ ही साथ जितना दोषी उन्होंने अन्यायी को माना उससे ज्यादा अन्याय सहने वाले को माना

वो कहते थे –

अन्याय इसलिए नहीं बढ़ रहे , क्योंकि अन्यायी ज्यादा हो गए हैं ,
बल्कि इसलिए कि उस अन्याय को सहने वाले ज्यादा बढ़ गए हैं ।
ऐसा नहीं है कि उनकी कलम में केवल विद्रोह की भावना ही थी ,दरअसल ये उस समय की माँग थी जिसके लिए एक कवि को लिखना जरूरी हो गया था , ताकि व्यवस्था में परिवर्तन आ सके |
इसके अलावा दुष्यंत कुमार जी ने अन्य कई विधाओं पर अपनी कलम चलाई, उनमें से उनकी कुछ बेहतरीन ग़ज़लों व कविताओं को मैंने संग्रहित करने का प्रयास किया है – तो चलिए पढ़िए उनकी सबसे बेहतरीन ग़ज़लें

 दुष्यंत कुमार जी की जयंती पर उनकी 6 बेहतरीन ग़ज़लें

ग़ज़ल न. 1  

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

 
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
 
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
 
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
 
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
 
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
 
दुष्यंत कुमार

 

ग़ज़ल न. 2

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ 

 

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ एतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जब से
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ |
दुष्यंत कुमार

ग़ज़ल न. 3

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए
,,,,,,,  चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है
चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़बान-ए-शायर को
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

जिएँ तो अपने बगीचे में गुल-मोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुल-मोहर के लिए |

दुष्यंत कुमार

ग़ज़ल न. 4

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है

 

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है
निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है |
– दुष्यंत कुमार

ग़ज़ल न. 5

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा 

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा
यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा
यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा
चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें
कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा |
– दुष्यंत कुमार

ग़ज़ल न. 6

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारों
अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारों
दर्द-ए-दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा
इस कबूतर को ज़रा प्यार से पालो यारों

लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारों

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे
,,,,,,, संदूक़ से वे ख़त तो निकालो यारों

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारों

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की
तुम ने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारों |

– दुष्यंत कुमार

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