अष्टछाप के कवि और उनकी रचनाएँ

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अष्टछाप के कवि परिचय और उनकी रचनाएँ

 

शुद्धाद्वैतवाद 

अष्टछाप के कवि और उनकी रचनाएँ 


इस लेख में हम ‘वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैतवाद का सामान्य रूप से व अष्टछाप के कवि और उनकी रचनाओं का विशेष रूप में अध्ययन करेंगे । अष्टछाप का कृष्ण भक्ति काव्य की प्रसिद्ध परम्परा है,  इसका हिन्दी साहित्य में एक अनूठा स्थान है, इस सम्बन्ध में हम आगे विस्तार से जानेंगे लेकिन इससे पूर्व आपको वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैतवाद को भलीभाँति समझ लेना चाहिए ।

 

मध्यकाल में कृष्णभक्ति के प्रचार-प्रसार में वल्लभ सम्प्रदाय और उसके अष्टछाप कवियों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वल्लभ सम्प्रदाय के प्रधान आचार्य और संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने सन् 1511 ई० के लगभग अपने मत का प्रधान केन्द्र श्रीनाथ जी के मन्दिर को बनाया। यह मन्दिर उनके ही एक शिष्य पूरनमल खत्री द्वारा उसी वर्ष बनवाया गया था।


वल्लभाचार्य –

 

वल्लभाचार्य मूलत: दक्षिण से थे और राजा कृष्णदेव राय के दरबार में शास्त्रार्थ द्वारा विभिन्न विद्वानों को पराजित कर ‘महाप्रभु’ की पदवीं से विभूषित थे। दर्शन के क्षेत्र में उनका मत शुद्धाद्वैतवाद के नाम से प्रचलित हुआ।

 

‘महाप्रभु’ का जन्म संवत् १५३५ विक्रमी, वैशाख कृष्ण एकादशी को रायपुर के निकट चम्पारण्य में विष्णुस्वामी मतावलम्बी भक्त श्रीलक्ष्मण भट्ट के यहाँ हुआ। इनकी माँ का नाम ‘इलम्मागारु’ था। कहते हैं कि, अल्प अवस्था में ही ये देशाटन को निकल पड़े और रामानुजाचार्य के समान भारत के बहुत से भागों में पर्यटन किया और शास्त्रार्थ द्वारा अपने मत का प्रचार किया। देशाटन से पूर्व इनका विवाह श्रीदेवभट्ट जी की कन्या महालक्ष्मी से हुआ। महालक्ष्मी जी से इन्हें दो पुत्र हुए – गोपीनाथ और विट्ठलनाथ।


शुद्धाद्वैतवाद

 

शुद्धाद्वैत = शुद्ध+अद्वैत । श्रीवल्लभाचार्य जी के अनुसार कार्य-कारणरूप जगत् ब्रह्म ही है। ब्रह्म अपनी इच्छा से ही जगत् रूप बना है। जगत् न मायिक है और न भगवान से भिन्न। यह ब्रह्म का अविकृत परिणाम है।

 

उनके अनुसार जिस प्रकार बूँद और समुद्र में तात्त्विक दृष्टि से कोई भेद नहीं हैं, परंतु बूँद अपने उद्भव और विकास के लिए समुद्र पर निर्भर करती है। उसी प्रकार जीव भी ब्रह्म के अनुग्रह पर निर्भर है। इसी अनुग्रह को उन्होंने पुष्टि की संज्ञा दी है। इसीलिए इनके सिद्धान्त को पुष्टिमार्ग भी कहा जाता है। भगवान् या ब्रह्म का अनुग्रह प्राप्त करने का सिद्धान्त यद्यपि वल्लभाचार्य का नवीन सिद्धान्त नहीं है। इसके प्राचीन सूत्र गीता में भी मिलते हैं।


पुष्टिमार्ग


अष्टछाप

पुष्टिमार्गीय भक्ति कर्मकाण्डमुक्त, ईश्वरीय अनुकम्पायुक्त रागानुरागा प्रेमलक्षणा भक्ति है, जिसका पल्लवन वल्लभाचार्य के बाद अष्टछाप कवियों ने मिलकर किया। इन कवियों ने अपनी भक्ति एवं काव्य के माध्यम से स्वयं को भगवत्कृपा पर छोड़ उनकी अनुकम्पा या अनुग्रह प्राप्त करने का ही प्रयत्न किया।

 

आचार्य वल्लभ ‘महाप्रभु’ जी ने कृष्ण को ही परमपिता परमेश्वर माना। वे नित्य, स्वतन्त्र और सर्वज्ञ हैं। सर्वत्र व्याप्त तथा नाशरहित हैं। वे पारमार्थिक सगुण रूप में लीलाएँ आचार्य वल्लभ ने श्रीकृष्ण को ही परमपिता परमेश्वर करते हैं।

 

उनकी लीलाएँ अप्राकृत हैं; जो उन्हीं के समान हैं। श्रीकृष्ण में ही तीनों गुण सत् चित् आनन्द की व्याप्ति है, जो शाश्वत है। अतः जीव को उन्हीं की अनुकम्पा या अनुग्रह प्राप्त करने का सुझाव दिया। जिसके लिए उन्होंने पुष्टि को आवश्यक बताया।

 

वैसे तो  वल्लभाचार्य ने कई ग्रन्थ लिखे, जिनमें पूर्वमीमांसा भाष्य, उत्तरमीमांसा या अणुभाष्य, सुबोधिनी टीका, तत्त्वदीप निबन्ध, पुरुषोत्तमसहस्रनाम, शृंगाररसमण्डन, विद्वन्मण्डन आदि मुख्य हैं। परंतु उनके शुद्धाद्वैतवाद का प्रतिपादक ब्रह्मसूत्र का ‘अणुभाष्य’ ही है।


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अष्टछाप


अष्टछाप कृष्ण भक्ति धारा के आठ कवियों का समूह है, जिसका मूल सम्बन्ध आचार्य वल्लभ द्वारा प्रतिपादित पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय से हैं । वल्लभ ने शंकर के अद्वैतवाद व मायावाद खंडन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण के सगुण रूप की स्थापना की और उनके भावनापूर्ण भक्ति के लिए भगवान् श्रीनाथ जी का मंदिर बनवाकर पुष्टिमार्गीय भक्ति को स्थापित किया ।

 

जब वल्लभाचार्य की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र गोपीनाथ का भी देहांत हो गया तो उनके कनिष्ठ पुत्र विट्ठलनाथ इस सम्प्रदाय के आचार्य हुए और उन्होंने पुष्टिमार्ग के विकास के लिए ‘अष्टछाप’ की स्थापना की, अष्टछाप की स्थापना विट्ठल नाथ जी ने 1565 ई० में की थी ।


अष्टछाप के आठ कवि


अष्टछाप के आठ कवियों में चार वल्लभाचार्य जी के शिष्य हैं और चार विट्ठल नाथ जी के शिष्य । वल्लभाचार्य जी के चार शिष्य हैं – 1. सूरदास 2. परमानंद दास 3. कुम्भनदास ४. कृष्णदास । विट्ठल नाथ जी के चार शिष्य हैं – 1. नंददास 2. चतुर्भुजदास 3. गोविंदस्वामी ४. छीतस्वामी । इन आठ कवियों का समूह ही ‘अष्टछाप’ नाम से प्रसिद्ध है । सूरदास इस ‘अष्टछाप’ के सबसे प्रमुख कवि हैं ।

 

वस्तुतः विट्ठल नाथ जी ने भगवान् श्रीनाथ जी के अष्ट शृंगार की परम्परा शुरू की थी और इन आठ कवियों का कार्य था – उन आठों समय/प्रहर में उपस्थित रहकर कृष्ण भक्ति के गीत प्रस्तुत करना । किंवदंती है कि, ये आठों भक्त भगवान् श्रीनाथ के सखा थे, इसीलिए उनकी नित्य लीला में भाग लेने के लिए इन्होंने श्रीनाथ जी के साथ जन्म ग्रहण किया था । इस दृष्टि से इन्हें ‘अष्टसखा’ भी कहा जाता है ।

 

श्रीनाथ जी की सेवा के आठ प्रहर जो हैं, वे निम्न्वत् हैं – 

ये आठ प्रहर हैं – 

  • श्रृंगार
  • मंगलाचरण
  • ग्वाल
  • राजयोग
  • उत्थापन
  • भोग
  • सन्ध्या आरती
  • शयन।

इन्हीं आठों प्रहर की सेवा के लिए मन्दिर प्रांगण में ये भक्त कवि पदों को गाया करते थे। इनके पदों से भक्ति और साहित्य की ऐसी स्वर्णिम लहर उठी, जिससे हिंदी साहित्य का सम्पूर्ण मध्यकाल भीग गया।


अष्टछाप में सबसे महत्त्वपूर्ण कवि


 

साहित्यिक मूल्यांकन की दृष्टि से देखें तो इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कवि ‘सूरदास’ हैं, जिन्होंने अपनी महान रचना ‘सूरसागर’ में कृष्ण के बाल-रूप, सखा-रूप तथा प्रेमी-रूप का अत्यंत विस्तृत, सूक्ष्म व मनोग्राही अंकन किया है । यही कारण है कि, स्वयं वल्लभाचार्य ने सूरदास को ‘पुष्टिमार्ग का जहाज’ कहा था ।

आचार्य शुक्ल भी सूर के बारे में कहते हैं –

आचार्यों की छाप लगी आठ कवियों की जो वीणाएँ कृष्ण माधुरी के गान में प्रवृत्त हुई, उनमें सर्वाधिक मधुर, सरस व मादक स्वर अंधे गायक सूर की वीणा का था ।

 

अष्टछाप में सूरदास के अतिरिक्त दो अन्य कवि भी साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं –

  • नंददास
  • कुम्भनदास ।

नंददास –

 

नंददास के कवित्व की प्रशंसा एक प्रसिद्ध कहावत में मिलती है – ‘’और कवि गड़िया, नंददास जड़िया ।‘’ नंददास ने ‘भंवरगीत’ व ‘पदावली’ जैसी रचनाएँ लिखी जिनमें कृष्ण के सगुण रूप को स्थापित किया गया है । नंददास की गोपियाँ तर्कशील हैं ।


एक उदाहरण देखें –

 

‘’जो उनके गुन नाहीं और गुनभये कहाँ तें ।

बीज बिना तरु जमै मोहि तुम कहौ कहाँ तें ।‘’



कुम्भनदास –

कुम्भनदास का भी साहित्यिक दृष्टि से पर्याप्त महत्त्व है । वे तो कृष्ण भक्ति के माधुर्य में इतना रमे हुए थे कि, उन्हें बादशाह का बुलावा भी नागवार गुजरा, वे कहते हैं कि  –

 

‘’संतन को कहा सीकरी सों काम ।

आवत जात पन्हैया टूटी, बिसरि गयो हरि नाम ।  

जाको देखे दुःख लागत, ताको करन परै परनाम ।

 

अष्टछाप का न सिर्फ कृष्ण काव्य परम्परा में बल्कि सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में अनूठा स्थान है । इन कवियों ने ब्रज भाषा में निहित गंभीर कलात्मकता और संगीतात्मक तत्त्व को जो ऊँचाई प्रदान की है, वह किसी भी माधुर्य भाव की कविता के लिए अनुकरणीय है ।


अष्टछाप के कवि और उनकी रचनाएँ


 इन कवियों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

 

१. कुम्भनदास

 

हरिरायकृत भावप्रकाश के अनुसार कुम्भनदास जी का जन्म गोवर्धन के निकट जमुनावती ग्राम में संवत् १५२५ विक्रमी कार्तिक कृष्ण एकादशी को हुआ। ये अष्टसखाओं में आयु की दृष्टि से सबसे बड़े थे। इनके सात पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटे चतुर्भुजदास थे। चतुर्भुजदास बाद में विट्ठलनाथ से दीक्षा लेकर पुष्टिमार्ग में प्रवृत्त हुए। कहते हैं, एक बार सम्राट् अकबर ने इनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर इन्हें फतेहपुर सीकरी बुलाया। न चाहते हुए भी इन्हें जाना पड़ा और बादशाह के सम्मुख सिर झुकाना पड़ा। जिसका बाद में इन्हें बड़ा दुःख हुआ; क्योंकि ये गिरिधर गोपाल की ही भक्ति करते थे। किसी अन्यके सम्मुख इन्हें सिर झुकाना पसन्द नहीं था।

 इस सन्दर्भ में इन्होंने अपने संताप को निम्न पद से व्यक्त किया –

 

“संतन को कहाँ सीकरी सों काम ?

आवत जात पनहियाँ टूटी, विसरि गयो हरिनाम । 

जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिवे परी सलाम।

कुंभनदास लाल गिरधर बिनु और सबै बेकाम ॥”

कुम्भनदास

 

इनके द्वारा कोई ग्रन्थ नहीं रचा गया, केवल कुछ पद ही वार्ता ग्रन्थों में मिलते हैं।


२. सूरदास

 

सूरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी दिन मंगलवार को संवत् १५३५ वि० सं० (1478 ई०) में रुनकता ग्राम में हुआ। ये कृष्ण के अनन्य भक्त थे। परम सत्य श्रीकृष्ण के बाल गोपालरूप का जैसी तन्मयता से वर्णन सूरदासजी ने किया, वैसा हिन्दी साहित्य में फिर कभी दुबारा न हुआ। वर्णनों में वात्सल्य और प्रेम की चासनी है। इनके विषय में प्रसिद्ध गायक तानसेन ने कहा है –

 

“किंधौ सूर को सर लग्यौ, किंधी सूर की पीर। 

किंधी सूर को पद लग्यौ, तन-मन धुनत सरीर ॥”

 

सूरदास की  रचनाएँ ):

 

इनके द्वारा रचित तीन ग्रन्थ मिलते हैं:-

 

  • सूरसागर (श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंध पर आधारित उत्कृष्ट रचना)
  • सूरसारावली (सं०१६०२) (ज्ञान,वैराग्य एवं भक्ति-वर्णन से सम्बंधित) 
  • साहित्यलहरी (सं०१५५० ) (नायिका-भेद एवं भक्ति-वर्णन से संबंधित रचना)।

 

सूरसारावली में लम्बे फगुआ (होली) गीत हैं। साहित्य-लहरीमें ११८ दृष्टकूट पद हैं, जिनका विषय नायिका भेद है। जो सम्भवतः कृष्णदास जी के आग्रह के उपरान्त लिखा गया। परंतु इनकी प्रसिद्धि का मूल भागवत पुराण का आधार लिए हुए सूरसागर ही है। इसी में निर्गुण पर सगुण की विजय दर्शाता प्रेम रस परिपूर्ण भ्रमरगीत-प्रसंग भी है। सूरसागर की काव्यतासे प्रभावित होकर आचार्य रामचन्द्र शुक्लने कहा है –

 

“यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यपूर्ण है कि, आगे होने वाले कवियों की श्रृंगार और वात्सल्य की उक्तियाँ सूर की जूठी-सी जान पड़ती हैं।”


निधन – 

संवत् १६२० के लगभग मथुरा के पारसौली ग्राम में विट्ठलनाथजी के सम्मुख सूरदास जी की मृत्यु हुई।

 

सूरदास जी ने अपने पदों में आसक्ति के ग्यारह रूपों का वर्णन किया है, परंतु संख्य, वात्सल्य, कान्ता, तन्मया और विरहासक्ति के वर्णनों में मिठास ज्यादा है। नारद भक्तिसूत्र के अनुसार जीव की प्रभु से आसक्ति के ग्यारह रूप हैं –

  1. गुणमाहात्म्यासक्ति
  2. रूपासक्ति
  3. पूजासक्ति
  4. स्मरणासक्ति
  5. दास्यासक्ति
  6. संख्यासक्ति
  7. कान्तासक्ति
  8. वात्सल्यासक्ति
  9. आत्मनिवेदनासक्ति
  10. तन्मयासक्ति
  11. परमविरहासक्ति (इसी परम विरहासक्ति से भ्रमरगीत के सारे पद भरे हैं)

“मधुवन तुम कत रहत हरे ।

विरह वियोग श्याम सुन्दर के ठाढ़े क्यों न जरे।।”

 

कृष्ण को बाल लीलाओं के पदों को देखकर नहीं लगता कि सूरदास जन्मान्ध थे। ब्रज और अवध प्रदेश में प्रचलित लोककथा के अनुसार श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य के रूप को न देखने की इच्छा से ही उन्होंने अपनी आँखें स्वयं फोड़ ली थीं।


३. परमानन्ददास

 

इनका जन्म सं० १५५० वि० सं० में कन्नौज (उत्तर प्रदेश) के गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। इन्होंने वल्लभाचार्य जी से अरैल (प्रयाग) में सं० १५७६ वि०सं० में दीक्षा ली। ब्रह्मचर्य को आजीवन पालन करते हुए श्रीकृष्ण के माधुर्यपक्ष और बाल-लीलाओं का गान किया। वल्लभाचार्य जी भी इनके पदों के प्रशंसक थे। इनके कई ग्रन्थ मिलते हैं, जिनमें ‘परमानन्द के पद’, ‘परमानन्द सागर’ महत्त्वपूर्ण हैं। इनकी मृत्यु सं० १६४१ वि० में मानी जाती है। भाषाई गठन और काव्यकला की दृष्टि से सूरदास और नन्ददास के उपरान्त इन्हीं का स्थान है।

 

 बालहठ सम्बन्धी इनका एक पद है-

“तनक तनक की दोहनी दै दैरी मैया।

 तात दुहन सिखवन कह्यो, मोहि धौरी गैया ॥ 

हरि विषमासन बैठि के बेदु कर थन लीन्हों। 

धार अटपटी देखि के ब्रजपति हसि दीन्हीं ॥ 

गृह-गृह से आई जबै, देखन ब्रज-नारी।

 सचकित तन-मन हरि लियौ, हँसि घोष बिहारी।।

द्विज बुलाया दक्षिणा दई, मंगलज जस गावै।

‘परमानन्द’ प्रभु लाडिलौ, सुख, सिंधु बढ़ावै।।”


४. कृष्णदास

 

इनका जन्म गुजरात राज्य के चिलोतरा ग्राम में हुआ था। सं० १५६६ वि० के लगभग मथुरा में वल्लभाचार्य जी ने इन्हें दीक्षा दी। अपनी प्रशासनिक रुचि के कारण ही ये श्रीनाथजी के मन्दिर के अधिकारी पद पर विभूषित हुए थे। कहते हैं कि वल्लभाचार्यजी की मृत्यु के बाद उनके पौत्र पुरुषोत्तम को गद्दी पर बिठाने के लिए इन्होंने विट्ठलनाथ जी से विवाद भी कर लिया था। मन्दिर के वैभव और ऐश्वर्य की वृद्धि में इनका ही महत्त्वपूर्ण योगदान था। इनका गोलोकवास लगभग संवत् १६६५ वि० में हुआ।

 कहते हैं, अन्त समय में उन्होंने यह पद गाया था –

“मो मन गिरिधर-छवि पै अटक्यो ।

ललित त्रिभंग चाल पै चलिकै, चिबुक चारु गढ़ि ठटक्यो ।

सजल स्याम घन बरन लीन है, फिरि चित अनत न भटक्यो।

कृष्णदास किये प्रान निछावर, यह तन जग सिर पटक्यो ।।”


५. नन्ददास

 

नन्ददास प्रसिद्ध कवि तुलसीदास के चचेरे भाई थे। इनका जन्म सं० १५९० वि० में हुआ तथा मृत्यु सं० १६३९ वि० में हुई। तुलसीदास और नन्ददास दोनों ने प्रारम्भ में नरहरि पण्डित से शिक्षा ग्रहण की। पंडित नृसिंह रामोपासक थे, अतः प्रारम्भमें इनकी रुचि रामभक्ति की ओर थी। किंतु एक दिन द्वारका जाते हुए मार्ग में इनकी मुलाकात विट्ठलनाथजी से हुई और वहीं इन्होंने पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली।

 

रचनाएँ :

 

इन्होंने कुल १५ ग्रन्थों की रचना की, जिनमें अनेकार्थमंजरी, मानमंजरी, रसमंजरी, रूपमंजरी, विरहमंजरी, प्रेम-बारहखड़ी, श्याम- सगाई, सुदामा चरित्र, रुक्मिणी-मंगल, भँवरगीत, रासपंचाध्यायी, सिद्धान्तपंचाध्यायी, दशमस्कन्धभाषा, गोवर्धनलीला, पदावली प्रमुख हैं।

 

इन्होंने अपने शुद्धाद्वैत-सम्बन्धी विचारों को अनेकार्थमंजरी में संकलित किया है। किंतु, लौकिक-पारलौकिक प्रेम एवं भाषा सौष्ठव की दृष्टिसे इनकी श्रेष्ठ कृति ‘रासपंचाध्यायी’ है। ‘रासपंचाध्यायी’ भागवत पुराण के २९वें से ३३वें अध्यायों का सम्मिलित नाम है। जो मूलतः रोला छन्द में है।

 

 रासपंचाध्यायी में ‘मुरली-वर्णन’ द्रष्टव्य है –

 

“तब लीनी कर-कमल जोग माया सी मुरली।

अघटित घटना चतुर बहुरि अधरासव जुर ली।।

जाको धुनि तें अगम निगम प्रगटे बड़ नागर।

नाद ब्रह्म की जननि मोहिनी सब बड़ सुख सागर॥

 नागर नवल किसोर कान्ह कल-गान कियो अस।

वाम विलोचन बालन को मन हरन होइ जस ॥


 ६. गोविन्दस्वामी

 

इनका जन्म सं० १५६२ वि० में भरतपुर राज्य में हुआ। कहते हैं तानसेन को पद-गायन की शिक्षा गोविन्द-स्वामी ने ही दी थी। इनकी कविताएँ मुख्यतः राधा कृष्ण की श्रृंगारिक लीलाओं सम्बन्धित हैं। कुछ पद बाललीला-विषयक भी हैं। इनके लगभग ६०० पदों का संकलन ‘गोविन्दस्वामी के पद’ शीर्षक से प्रकाशित है। 

 

इनके पदों की बानगी द्रष्टव्य है-

 

“प्रातसमय उठि जसुमति जननी गिरिधरसुतको उबटि न्हवावति।

करि सिंगार, बसन-भूषण सजि, फूलन रचि-रचि पाग बनावति।।

 छूटे बंद, बागे अति सोभित, विच-बिच चोव-अरगजा लावति।

लाल फूंदना सोभित, आजुकि छवि कछु कहति न आवति।।

विविध कुसुमको माला उर धरि, श्रीकर मुरली बेंत गहावति।

 लै दरपन देखें श्रीमुखको, गोविंद प्रभुचरननि सिर नावति ॥”


७. छीतस्वामी

 

ये मथुरा के ब्राह्मण और राजा बीरबल के पुरोहित थे। गोस्वामी विट्ठलनाथजी की चमत्कारपूर्ण दिव्य शक्ति से  प्रभावित होकर इन्होंने सं० १५९२ वि० के लगभग उनसे दीक्षा ली। ये मूलतः अपने पदों में भक्तिभाव की ही अभिव्यक्ति किया करते थे। इनका यह पद बड़ा ही प्रसिद्ध है –

 

“अहो विधना! तो पै अंचरा प्रसार मांगी। 

जनम-जनम दीजो मोहि यही ब्रज वसिनी ॥”


८. चतुर्भुजदास

 

कुम्भनदास जी के सात पुत्रों में चतुर्भुजदास जी सबसे छोटे थे। परम्परागत खेती-बाड़ी से अलग संगीत-काव्य और भजन-कीर्तन की ओर ही इनकी रुचि थी। इनको गान विद्या स्वयं इनके पिता कुम्भनदास जी ने दी थी। इनके पदों में श्रृंगार की अद्भुत छटा है, जो इनके द्वारा रचितः ग्रन्थों ‘चतुर्भुज कीर्तन’, ‘कीर्तनावली’ और ‘दानलीला’ में संग्रहीत हैं। 

 

इनका एक पद द्रष्टव्य है-

 

“जसोदा!कहा कहौं हौं बात?

तुम्हरे सूत के करतब मो पै कहत कहे नहिं जात।।

भाजन फोरि,ढारि सब गोरस,लै माखन दधि खात।

जौ बरजौ तौ आँखि दिखावै,रंचहु नाहिं सकात।।

और अटपटी कहँ लौ बरनौ,छुवत पानि सों गात।

दास चतुर्भुज गिरिधर गुन हौं कहति कहति सकुचात।।”


अष्टछाप : स्मरणीय तथ्य

 

  • अष्टछाप के संस्थापक वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ थे ।
  • अष्टछाप की स्थापना 1565 ई० में हुई थी ।
  • अष्टछाप में आठ कवि शामिल थे जिनमें चार (4) शिष्य वल्लभाचार्य के थे और चार (4) विट्ठलनाथ के शिष्य थे ।
  • वल्लभाचार्य के चार शिष्य – कुम्भनदास, सूरदास, परमानंददास, कृष्ण दास ।
  • विट्ठलनाथ के चार शिष्य – गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास, नंददास ।
  • अष्टछाप अथवा अष्टसखा के कवियों का रचनाकाल 1500 से 1585 ई० है ।
  • अष्टछाप के कवियों में भाषा के सबसे धनी कवि – सूरदास
  • अष्टछाप के कवियों में सूर के पश्चात् सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि – नंददास
  • अष्टछाप के कवियों में शब्द-शिल्पी – नंददास
  • अष्टछाप के कवियों में काव्य-सौष्ठव एवं भाषा की प्रांजलता में सूरदास के बाद दूसरे स्थान के कवि – नंददास
  • अष्टछाप के प्रथम कवि – कुम्भनदास

अष्टछाप के कवियों का कालक्रम, जन्म, निवास स्थान

कविसमयजातिजन्म स्थान निवास स्थान
कुम्भनदास1468-1582गोरवा क्षत्रियजमुनावती उ.प्र.जमुनावती
सूरदास1478-1583सारस्वत ब्राह्मणसीही उ.प्र.पारसौली
परमानंददास1493-1583कान्यकुब्जकन्नौज उ.प्र.सुरभीकुंड
कृष्णदास1495-1575शूद्रचिलोतरा, गुजरातबिलछूकुंड
गोविन्ददास1505-1585सनाढ्य ब्राह्मणआंतरी, भरतपुरमहावन ब्रजमंडल
छीतस्वामी1501-1585माथुर चौबेमथुरापुंछरी (गोवर्द्धन पर्वत)
चतुर्भुजदास1530-1585गोरवा क्षत्रियजमुनावती उ.प्र.जमुनावती
नंददास1533-1586सनाढ्य ब्राह्मणरामपुर उ.प्र.मानसीगंगा

 


  • अष्टछाप कवियों में वह कवि जिनका महत्त्व साहित्यिक दृष्टि से न होकर ऐतिहासिक दृष्टि और व्यवस्था – संचालन की दृष्टि से था – कृष्णदास
  • रचना की प्रचुरता तथा विषय की विविधता की दृष्टि से अष्टछाप के कवियों में सबसे ऊँचा स्थान – नंददास
  • अष्टछाप के कवियों में पिता-पुत्र कवि – (कुम्भनदास – चतुर्भुजदास)
  • अष्टछाप में प्रथम व सबसे ज्येष्ठ कवि – कुम्भनदास
  • अष्टछाप के सबसे कनिष्ठ कवि – नंददास
  • काव्य सौष्ठव एवं साहित्य-रचना की उत्कृष्टता की दृष्टि से अष्टछाप के कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि – सूरदास (नंददास दूसरे स्थान पर)
  • अष्टछाप के कवियों में सूर के बाद कृष्ण की सम्पूर्ण लीलाओं पर रचना करने वाले कवि – परमानंददास
  • अष्टछाप के कवियों में अपनी उद्दंडता के कारण प्रसिद्ध कवि – छीतस्वामी
  • काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से सूर एवं नंददास के बाद अष्टछाप के कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्तकर्ता कवि – परमानंददास
  • अष्टछाप के वह कवि जिनके पद सुनकर वल्लभाचार्य कई दिनों तक बेहोश पड़े रहे थे – परमानंददास
  • अष्टछाप का वह कवि जिनके मनोहर गान को सुनने एवं संगीत सीखने के लिए स्वयं तानसेन उपस्थित हुए थे – गोविंदस्वामी
  • अष्टछाप कवियों में प्रसिद्ध संगीतज्ञ एवं गवैये कवि – गोविन्दस्वामी
  • अष्टछाप के कवियों में बुद्धि, योग्यता एवं प्रबंध-कुशलता के कारण अधिकारी पद पर आसीन होने वाले कवि – कृष्णदास
  • अष्टछाप के कवियों में सर्वाधिक काव्यशास्त्रीय कवि – नंददास

स्मरणीय तथ्य

  • राजा मानसिंह ने किस अष्टछाप कवि को सोने की तलवार, मुहरें आदि देनी चाहिए थी जिसे उन्होंने इनकार कर दिया था – कुम्भनदास
  • मुग़ल सम्राट अकबर के फतेहपुर निमंत्रण पर किस अष्टछाप के कवि को बेहद ग्लानि हुई थी और उन्होंने यह कहा था – ‘’संतान को कहा सीकरी सों काम’’ (कुम्भनदास)
  • अष्टछाप के कवियों का प्रधान विषय – कृष्णलीला व कृष्णभक्ति
  • अष्टछाप के कवियों में कृष्णलीला का सम्पूर्ण वर्णन करने वाले कवि – सूरदास एवं परमानंददास
  • शब्द-गठन कौशल की दृष्टि से अष्टछाप कवियों में सर्वश्रेष्ठ नंददास थे तो पद-रचना की दृष्टि से परमानंददास तथा संगीतात्मकता की दृष्टि से थे – गोविंदस्वामी
  • अष्टछाप कवियों में जड़िया कवि – नंददास (रासपंचाध्यायी रचना में अद्भुत शब्द गठन कौशल के कारण)
  • अष्टछाप कवियों में ‘हिन्दी का गीतगोविन्द’ कही जाने वाली रचना रासपंचाध्यायी नंददास कृत (वियोगी हरि ने कोमलकांत पदावली के कारण कहा है)
  • राजस्थान से सम्बंधित अष्टछाप कवियों में एकमात्र कवि जिनका सम्बन्ध आंतरी भरतपुर से था – गोविंदस्वामी
  • ब्रजमंडल के महावन स्थान (कदमखंदी स्थान) में निवास करने वाले अष्टछाप कवि – गोविंदस्वामी     

माधव शर्मा/हिन्दी ज्ञान सागर 

स्रोत ग्रन्थ : हिन्दी साहित्य / दृष्टि हिन्दी साहित्य 

 

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