बंग महिला की दुलाईवाली कहानी है हिंदी की आरंभिक कहानियों में शामिल

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दुलाईवाली कहानी

दुलाईवाली कहानी


दुलाईवाली कहानी की रचनाकार/लेखिका राजेन्द्र बाला घोष उर्फ ‘बंग महिला’ हैं । यह इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कहानी है, दुलाईवाली कहानी सर्वप्रथम 1907 ई० में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने दुलाईवाली कहानी की गणना हिंदी की आरंभिक कहानियों में की है।

 

महत्त्वपूर्ण तथ्य :-

  1. सुधाकर पांडे ने दुलाईवाली कहानी को हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी माना।
  2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इंदुमती के बाद दूसरे और तीसरे स्थान पर ग्यारह वर्ष का समय और दुलाईवाली कहानी को रखा है ।
  3. बंग महिला (राजेन्द्र बाला घोषा) की दुलाईवाली कहानी को हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी स्वीकारना महिला सशक्तीकरण की आधारभूमि तैयार करना ही था ।
  4. इसकी पहली अनुगूँज (कहानी में) बंग महिला (राजेन्द्र बालाघोष) की ‘कुम्भ में छोटी बहू’ और दुलाईवाली कहानी में सुनाई देती है ।
  5. आचार्य शुक्ल ने हिन्दी की प्रारम्भिक कहानियों की संभावित सूची में बंगमहिला की दुलाईवाली कहानी को भी रखा है, ये मिर्जापुर में रहती थीं और इनका पूरा नाम राजेन्द्रबाला घोष था ।
  6. उनकी दुलाईवाली कहानी में यथार्थचित्रण व्यंग्य-विनोद, पात्र के अनुरूप भाषा शैली और स्थानीय रंग का इतना जीवन्त तालमेल था कि, यह कहानी उस समय की महत्त्वपूर्ण कृति बन गई ।
  7. उन्होंने बहुत-सी कहानियों का बंगला से अनुवाद तो किया ही, हिन्दी में कुछ मौलिक कहानियाँ भी लिखीं जिनमें से एक थी दुलाईवाली कहानी जो संवत् 1964 की ‘सरस्वती’ (भाग 8, संख्या 5) में प्रकाशित हुई ।

बंग महिला एक कहानीकार के रूप में –

हिंदी की पहली महिला कहानीकार के रूप में विख्यात हैं, जिनका पूरा नाम राजेन्द्र बाला घोष है । मूलतः ये बंगाली हैं, लेकिन हिंदी से इन्हें अनन्य अनुराग था । हिंदी की आरंभिक कहानीकारों में इनकी  गणना की जाती है, इनकी सबसे प्रमुख कहानी है – दुलाईवाली कहानी जो 1907 ई० में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । भाई-बहन, ह्रदय-परीक्षा इनकी अन्य प्रमुख कहानियाँ हैं । इनकी कहानियों का संकलन ‘कुसुम-संग्रह’ नाम से प्रकाशित किया गया है । पूरा पढ़ें…


दुलाईवाली कहानी की विषयवस्तु –

नवल किशोर द्वारा अपने मित्र बंशीधर से रेल में किए गए मजाक की सरस कहानी । हास्य सृजन की परम्परा से हटकर मौलिकता और सृजनशीलता का अद्भुत प्रयोग । काशी और उसके आस-पास के जन-जीवन व स्त्री-पुरुष की सोच तथा मनोभावों का स्वाभाविक चित्रण । विदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर व्यंग्य | कहानी की शुरुआत काशी के दशाश्वमेध से शुरू होकर इलाहबाद (वर्तमान प्रयागराज) पर समाप्त होती है ।


दुलाईवाली कहानी के पात्र –

बंशीधर,बंशीधर की पत्नी जानकी देई, जानकी देई की छोटी बहन सीता, बंशीधर का मित्र नवलकिशोर और नवलकिशोर की पत्नी |


दुलाईवाली कहानी के प्रमुख उद्धरण –

  • ‘’नाहक विलायती चीजें मोल लेकर क्यों रूपए की बर्बादी की जाए | देशी लेने से भी दाम लेगा सही पर रहेगा तो देश ही में |’’
  • खैर, दोनों मित्र अपनी-अपनी घरवाली को लेकर राजी-ख़ुशी घर पहुंचे और मुझे भी उनकी यह राम कहानी लिखने से छुट्टी मिली |’’

दुलाईवाली कहानी – बंग महिला

काशी जी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान करके एक मनुष्य बड़ी व्यग्रता के साथ गोदौलिया की तरफ आ रहा था । एक हाथ में एक मैली-सी तौलिए में लपेटी हुई भीगी धोती और दूसरे में सुरती की गोलियों की कई डिबियाँ और सुंघनी की एक पुड़िया थी। उस समय दिन के ग्यारह बजे थे, गोदौलिया की बायीं तरफ जो गली है, उसके भीतर एक और गली में थोड़ी दूर पर, एक टूटे-से पुराने मकान में वह जा घुसा। मकान के पहले खण्ड  में बहुत अंधेरा था; पर ऊपर की जगह मनुष्य के वासोपयोगी थी। नवागत मनुष्य धड़धड़ाता हुआ ऊपर चढ़ गया। वहाँ एक कोठरी में उसने हाथ की चीजें रख दीं। और, सीता! सीता! कहकर पुकारने लगा।

क्या है? कहती हुई एक दस बरस की बालिका आ खड़ी हुई, तब उस पुरुष ने कहा, सीता! जरा अपनी बहन को बुला ला।

अच्छा!, कहकर सीता गई और कुछ देर में एक नवीना स्त्री आकर उपस्थित हुई। उसे देखते ही पुरुष ने कहा, लो, हम लोगों को तो आज ही जाना होगा!

इस बात को सुनकर स्त्री कुछ आश्चदर्य युक्त होकर और झुंझलाकर बोली, आज ही जाना होगा! यह क्यों? भला आज कैसे जाना हो सकेगा? ऐसा ही था तो सवेरे भैया से कह देते। तुम तो जानते हो कि, मुंह से कह दिया, बस छुट्टी हुई। लड़की कभी विदा की होती तो मालूम पड़ता। आज तो किसी सूरत जाना नहीं हो सकता!

तुम आज कहती हो! हमें तो अभी जाना है। बात यह है कि आज ही नवलकिशोर कलकत्ते से आ रहे हैं। आगरे से अपनी नई बहू को भी साथ ला रहे हैं। सो उन्होंने हमें आज ही जाने के लिए इसरार किया है। हम सब लोग मुगलसराय से साथ ही इलाहाबाद चलेंगे। उनका तार मुझे घर से निकलते ही मिला। इसी से मैं झट नहा-धोकर लौट आया। बस अब करना ही क्या  है! कपड़ा-वपड़ा जो कुछ हो बांध-बूंधकर, घण्टे भर में खा-पीकर चली चलो। जब हम तुम्हें विदा कराने आए ही हैं तब कल के बदले आज ही सही।

हाँ, यह बात है! नवल जो चाहें करावें। क्या एक ही गाड़ी में न जाने से दोस्ती में बट्टा लग जाएगा? अब तो किसी तरह रुकोगे नहीं, जरूर ही उनके साथ जाओगे। पर मेरे तो नाकों दम आ जाएगी।

क्यों? किस बात से?

उनकी हंसी से और किससे! हंसी-ठट्ठा भी राह में अच्छी लगती है। उनकी हंसी मुझे नहीं भाती। एक रोज मैं चौक में बैठी पूड़ियाँ काढ़ रही थी, कि इतने में न-जाने कहाँ से आकर नवल चिल्लाने लगे, ए बुआ! ए बुआ! देखो तुम्हाोरी बहू पूड़ियाँ खा रही है। मैं तो मारे सरम के मर गई। हाँ, भाभी जी ने बात उड़ा दी सही। वे बोलीं, खाने-पहनने के लिए तो आयी ही है। पर मुझे उनकी हँसी बहुत बुरी लगी।

बस इसी से तुम उनके साथ नहीं जाना चाहतीं? अच्छा चलो, मैं नवल से कह दूंगा कि, यह बेचारी कभी रोटी तक तो खाती ही नहीं, पूड़ी क्यों खाने लगी।

इतना कहकर बंशीधर कोठरी के बाहर चले आये और बोले, मैं तुम्हारे भैया के पास जाता हूँ। तुम रो-रुलाकर तैयार हो जाना।

इतना सुनते ही जानकी देई की आंखें भर आयीं। और असाढ़-सावन की ऐसी झड़ी लग गयी।

बंशीधर इलाहाबाद के रहने वाले हैं। बनारस में ससुराल है। स्त्री को विदा कराने आये हैं। ससुराल में एक साले, साली और सास के सिवा और कोई नहीं है। नवलकिशोर इनके दूर के नाते में ममेरे भाई हैं। पर दोनों में मित्रता का खयाल अधिक है। दोनों में गहरी मित्रता है, दोनों एक जान दो कालिब हैं।

उसी दिन बंशीधर का जाना स्थिर हो गया। सीता, बहन के संग जाने के लिए रोने लगी। माँ रोती-धोती लड़की की विदा की सामग्री इकट्ठी करने लगी। जानकी देई भी रोती ही रोती तैयार होने लगी। कोई चीज भूलने पर धीमी आवाज से माँ को याद भी दिलाती गयी। एक बजने पर स्टेशन जाने का समय आया। अब गाड़ी या इक्का लाने कौन जाय? ससुरालवालों की अवस्था अब आगे की-सी नहीं कि, दो-चार नौकर-चाकर हर समय बने रहें। सीता के बाप के न रहने से काम बिगड़ गया है। पैसे वाले के यहाँ नौकर-चाकरों के सिवा और भी दो-चार खुशामदी घेरे रहते हैं।

छूछे को कौन पूछे? एक कहारिन है सो भी इस समय कहीं गयी है। सालेराम की तबीयत अच्छीा नहीं। वे हर घड़ी बिछौने से बातें करते हैं। तिस पर भी आप कहने लगे, मैं ही धीरे-धीरे जाकर कोई सवारी ले आता हूँ, नजदीक तो है।

बंशीधर बोले, नहीं, नहीं, तुम क्यों तकलीफ करोगे? मैं ही जाता हूँ। जाते-जाते बंशीधर विचारने लगे कि इक्के की सवारी तो भले घर की स्त्रियों के बैठने लायक नहीं होती, क्योंकि एक तो इतने ऊँचे पर चढ़ना पड़ता है, दूसरे पराये पुरुष के संग एक साथ बैठना पड़ता है। मैं एक पालकी गाड़ी ही कर लूं। उसमें सब तरह का आराम रहता है। पर जब गाड़ी वाले ने डेढ़ रुपया किराया मांगा, तब बंशीधर ने कहा, चलो इक्का ही सही। पँहुचने से काम। कुछ नवलकिशोर तो यहाँ से साथ हैं नहीं, इलाहाबाद में देखा जाएगा।

बंशीधर इक्का ले आये, और जो कुछ असबाब था, इक्के पर रखकर आप भी बैठ गये। जानकी देई बड़ी विकलता से रोती हुई इक्के पर जा बैठी। पर इस अस्थिर संसार में स्थिरता कहाँ! यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं। इक्का जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया वैसे जानकी की रुलाई भी कम होती गयी। सिकरौल के स्टेशन के पास पहुंचते-पहुंचते जानकी अपनी आंखें अच्छी तरह पोंछ चुकी थी।

दोनों चुपचाप चले जा रहे थे कि, अचानक बंशीधर की नजर अपनी धोती पर पड़ी और अरे एक बात तो हम भूल ही गये। कहकर पछता से उठे। इक्के वाले के कान बचाकर जानकी जी ने पूछा, क्या हुआ? क्या  कोई जरूरी चीज भूल आये?

नहीं, एक देशी धोती पहिनकर आना था सो भूलकर विलायती ही पहिन आये। नवल कट्टर स्वंदेशी हुए हैं न! वे बंगालियों से भी बढ़ गये हैं। देखेंगे तो दो-चार सुनाये बिना न रहेंगे। और, बात भी ठीक है। नाहक बिलायती चीजें मोल लेकर क्यों रुपये की बरबादी की जाय। देशी लेने से भी दाम लगेगा सही पर रहेगा तो देश ही में।

जानकी जरा भौंहें टेढ़ी करके बोली, ऊँह! धोती तो धोती, पहिनने से काम। क्या  यह बुरी है?

इतने में स्टेशन के कुलियों ने आ घेरा। बंशीधर एक कुली करके चले। इतने में इक्के वाले ने कहा, इधर से टिकट लेते जाइए। पुल के उस पार तो ड्योढ़े दरजे का टिकट मिलता है।

बंशीधर फिरकर बोले, अगर मैं ड्योढ़े दरजे का ही टिकट लूँ तो?

इक्केवाला चुप ही रहा। इक्के की सवारी देखकर इसने ऐसा कहा, यह कहते हुए बंशीधर आगे बढ़ गये। यथा-समय रेल पर बैठकर बंशीधर राजघाट पार करके मुगलसराय पहुंचे। वहां पुल लाँघकर दूसरे प्लेटफार्म पर जा बैठे। आप नवल से मिलने की खुशी में प्लेटफार्म के इस छोर से उस छोर तक टहलते रहे। देखते-देखते गाड़ी का धुआँ दिखलाई पड़ा। मुसाफिर अपनी-अपनी गठरी संभालने लगे।

रेल देवी भी अपनी चाल धीमी करती हुई गम्भीरता से आ खड़ी हुई। बंशीधर एक बार चलती गाड़ी ही में शुरू से आखिर तक देख गये, पर नवल का कहीं पता नहीं। बंशीधर फिर सब गाड़ियों को दोहरा गये, तेहरा गये, भीतर घुस-घुसकर एक-एक डिब्बे को देखा किंतु नवल न मिले। अंत को आप खिजला उठे, और सोचने लगे कि, मुझे तो वैसी चिट्ठी लिखी, और आप न आया। मुझे अच्छा उल्लू बनाया। अच्छा जाएंगे कहां? भेंट होने पर समझ लूंगा।

सबसे अधिक सोच तो इस बात का था कि, जानकी सुनेगी तो ताने पर ताना मारेगी। पर अब सोचने का समय नहीं। रेल की बात ठहरी, बंशीधर झट गये और जानकी को लाकर जनानी गाड़ी में बिठाया। वह पूछने लगी, नवल की बहू कहां है? वह नहीं आये, कोई अटकाव हो गया, कहकर आप बगल वाले कमरे में जा बैठे। टिकट तो ड्योढ़े का था पर ड्योढ़े दरजे का कमरा कलकत्ते से आनेवाले मुसाफिरों से भरा था, इसलिए तीसरे दरजे में बैठना पड़ा। जिस गाड़ी में बंशीधर बैठे थे उसके सब कमरों में मिलाकर कल दस-बारह ही स्त्री-पुरुष थे। समय पर गाड़ी छूटी। नवल की बातें, और न-जाने क्या  अगड़-बगड़ सोचते गाड़ी कई स्टेशन पार करके मिरजापुर पहुंची।

मिरजापुर में पेटराम की शिकायत शुरू हुई। उसने सुझाया कि, इलाहाबाद पहुँचने में अभी देरी है। चलने के झंझट में अच्छी तरह उसकी पूजा किये बिना ही बंशीधर ने बनारस छोड़ा था। इसलिए आप झट प्लेटफार्म पर उतरे, और पानी के बम्बे से हाथ-मुंह धोकर, एक खोंचेवाले से थोड़ी-सी ताजी पूड़ियां और मिठाई लेकर, निराले में बैठ आपने उन्हें ठिकाने पहुंचाया।

पीछे से जानकी की सुध आयी। सोचा कि पहले पूछ लें, तब कुछ मोल लेंगे, क्योंकि स्त्रियाँ नटखट होती हैं। वे रेल पर खाना पसंद नहीं करतीं। पूछने पर वही बात हुई। तब बंशीधर लौटकर अपने कमरे में आ बैठे। यदि वे चाहते तो इस समय ड्योढ़े में बैठ जाते क्योंकि अब भीड़ कम हो गयी थी। पर उन्होंने कहा, थोड़ी देर के लिए कौन बखेड़ा करे।

बंशीधर अपने कमरे में बैठे तो दो-एक मुसाफिर अधिक देख पड़े। आगेवालों में से एक उतर भी गया था। जो लोग थे सब तीसरे दरजे के योग्य जान पड़ते थे अधिक सभ्य  कोई थे तो बंशीधर ही थे। उनके कमरे के पास वाले कमरे में एक भले घर की स्त्री बैठी थी। वह बेचारी सिर से पैर तक ओढ़े, सिर झुकाए एक हाथ लंबा घूंघट काढ़े, कपड़े की गठरी-सी बनी बैठी थी, बंशीधर ने सोचा इनके संग वाले भद्र पुरुष के आने पर उनके साथ बातचीत करके समय बितावेंगे।

एक-दो करके तीसरी घण्टी् बजी। तब वह स्त्री् कुछ अकचकाकर, थोड़ा-सा मुंह खोल, जंगले के बाहर देखने लगी। ज्योंही गाड़ी छूटी, वह मानो कांप-सी उठी। रेल का देना-लेना तो हो ही गया था। अब उसको किसी की क्या परवा? वह अपनी स्वाभाविक गति से चलने लगी। प्लेटफार्म पर भीड़ भी न थी। केवल दो-चार आदमी रेल की अंतिम विदाई तक खड़े थे। जब तक स्टेशन दिखलाई दिया तब तक वह बेचारी बाहर ही देखती रही। फिर अस्पष्ट  स्वर से रोने लगी। उस कमरे में तीन-चार प्रौढ़ा ग्रामीण स्त्रियां भी थीं। एक, जो उसके पास ही थी, कहने लगी- ‘’अरे इनकर मनई तो नाहीं आइलेन। हो देखहो, रोवल करथईन।‘’

दूसरी, ‘’अरे दूसर गाड़ी में बैठा होंइहें।‘’

पहली, दुर बौरही! ई जनानी गाड़ी थेड़े है।

दूसरी, तऊ हो भलू तो कहू। कहकर दूसरी भद्र महिला से पूछने लगी, कौन गाँव उतरबू बेटा! मीरजैपुरा चढ़ी हऊ न? इसके जवाब में उसने जो कहा सो वह न सुन सकी।

तब पहली बोली, हट हम पुंछिला नय हम कहा काहाँ ऊतरबू हो? आंय ईलाहाबास?

दूसरी, ईलाहाबास कौन गाँव हौ गोइयाँ?

पहली, ‘’अरे नाहीं जनंलू? पैयाग जी, जहां मनई मकर नाहाए जाला।‘’

दूसरी, ‘’भला पैयाग जी काहे न जानीथ ले कहै के नाहीं, तोहरे पंच के धरम से चार दांई नहाय चुकी हंई। ऐसों हो सोमवारी, अउर गहन, दका, दका, लाग रहा तउन तोहरे काशी जी नाहाय गइ रहे।‘’

पहली, ‘’आवे जाय के तो सब अऊते जाता बटले बाटेन। फुन यह साइत तो बिचारो विपत में न पड़ल बाटिली। हे हम पंचा हइय राजघाट टिकस कटऊली; मोंगल के सरायैं उतरलीहय हो द पुन चढ़लीह।‘’

दूसरी, ‘’ऐसे एक दांई हम आवत रहे। एक मिली औरो मोरे संघे रही। दकौने टिसनीया पर उकर मलिकवा उतरे से कि जुरतंइहैं गड़िया खुली। अब भइया ऊगरा फाड़-फाड़ नरियाय, ए साहब, गड़िया खड़ी कर! ए साहेब, गड़िया तंनी खड़ी कर! भला गड़िया दहिनाती काहै के खड़ी होय?’’

पहली, ‘’उ मेहररुवा बड़ी उजबक रहल। भला केहू के चिल्लाहये से रेलीऔ कहूं खड़ी होला?’’

इसकी इस बात पर कुल कमरे वाले हंस पड़े। अब जितने पुरुष-स्त्रियां थीं, एक से एक अनोखी बातें कहकर अपने-अपने तजरुबे बयान करने लगीं। बीचबीच में उस अकेली अबला की स्थिति पर भी दुःख प्रकट करती जाती थीं।

तीसरी स्त्रीा बोली, टीक्कटसिया पल्ले बाय क नाँहीं हे सहेबवा सुनि तो कलकत्ते तांई ले मसुलिया लेई। अरे-इहो तो नांही कि दूर से आवत रहले न, फरागत के बदे उतर लेन।

चैथी, हम तो इनके संगे के आदमी के देखबो न किहो गोइयां।‘’

तीसरी, ‘’हम देखे रहली हो, मजेक टोपी दिहले रहलेन को।‘’

इस तरह उनकी बेसिर-पैर की बातें सुनते-सुनते बंशीधर ऊब उठे। तब वे उन स्त्रियों से कहने लगे, तुम तो नाहक उन्हें और भी डरा रही हो। जरूर इलाहाबाद तार गया होगा और दूसरी गाड़ी से वे भी वहाँ पहुँच जाएँगे। मैं भी इलाहाबाद ही जा रहा हूं। मेरे संग भी स्त्रियाँ हैं। जो ऐसा ही है तो दूसरी गाड़ी के आने तक मैं स्टेशन ही पर ठहरा रहूंगा, तुम लोगों में से यदि कोई प्रयाग उतरे तो थोड़ी देर के लिए स्टेशन पर ठहर जाना। इनको अकेला छोड़ देना उचित नहीं। यदि पता मालूम हो जाएगा तो मैं इन्हें इनके ठहरने के स्थान पर भी पहुंचा दूंगा।

बंशीधर की इन बातों से उन स्त्रियों की वाक्-धारा दूसरी ओर बह चली, हाँ, यह बात तो आप भली कही। नाहीं भइया! हम पंचे काहिके केहुसे कुछ कही। अरे एक के एक करत न बाय तो दुनिया चलत कैसे बाय? इत्याीदि ज्ञानगाथा होने लगी।

कोई-कोई तो उस बेचारी को सहारा मिलते देख खुश हुए और कोई-कोई नाराज भी हुए, क्यों, सो मैं नहीं बतला सकती। उस गाड़ी में जितने मनुष्य थे, सभी ने इस विषय में कुछ-न-कुछ कह डाला था। पिछले कमरे में केवल एक स्त्री जो फरासीसी छींट की दुलाई ओढ़े अकेली बैठी थी, कुछ नहीं बोली। कभी-कभी घूंघट के भीतर से एक आंख निकालकर बंशीधर की ओर वह ताक देती थी और, सामना हो जाने पर, फिर मुंह फेर लेती थी। बंशीधर सोचने लगे कि, यह क्या बात है? देखने में तो यह भले घर की मालूम होती है, पर आचरण इसका अच्छा नहीं।

गाड़ी इलाहाबाद के पास पहुंचने को हुई। बंशीधर उस स्त्री को धीरज दिलाकर आकाश-पाताल सोचने लगे। यदि तार में कोई खबर न आयी होगी तो दूसरी गाड़ी तक स्टेसशन पर ही ठहरना पड़ेगा। और जो उससे भी कोई न आया तो क्या करूंगा? जो हो गाड़ी नैनी से छूट गयी। अब साथ की उन अशिक्षिता स्त्रियों ने फिर मुंह खोला, क भइया, जो केहु बिना टिक्कास के आवत होय तो ओकर का सजाय होला? अरे ओंका ई नाहीं चाहत रहा कि मेहरारू के तो बैठा दिहलेन, अउर अपुआ तउन टिक्कवस लेई के चल दिहलेन!

किसी-किसी आदमी ने तो यहाँ तक दौड़ मारी कि, रात को बंशीधर इसके जेवर छीनकर रफूचक्कर हो जाएंगे। उस गाड़ी में एक लाठीवाला भी था, उसने खुल्लमखुल्ला कहा, का बाबू जी! कुछ हमरो साझा!

इसकी बात पर बंशीधर क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने इसे खूब धमकाया। उस समय तो वह चुप हो गया, पर यदि इलाहाबाद उतरता तो बंशीधर से बदला लिये बिना न रहता। बंशीधर इलाहाबाद में उतरे। एक बुढ़िया को भी वहीं उतरना था। उससे उन्होंने कहा कि, उनको भी अपने संग उतार लो। फिर उस बुढ़िया को उस स्त्री के पास बिठाकर आप जानकी को उतारने गये।

जानकी से सब हाल कहने पर वह बोली, अरे जाने भी दो किस बखेड़े में पड़े हो। पर बंशीधर ने न माना। जानकी को और उस भद्र महिला को एक ठिकाने बिठाकर आप स्टेशन मास्टर के पास गये। बंशीधर के जाते ही वह बुढ़िया, जिसे उन्होंने रखवाली के लिए रख छोड़ा था, किसी बहाने से भाग गयी। अब तो बंशीधर बड़े असमंजस में पड़े। टिकट के लिए बखेड़ा होगा। क्योंकि वह स्त्री बे-टिकट है। लौटकर आये तो किसी को न पाया। अरे ये सब कहां गयीं? यह कहकर चारों तरफ देखने लगे। कहीं पता नहीं।

इस पर बंशीधर घबराये, आज कैसी बुरी साइत में घर से निकले कि एक के बाद दूसरी आफत में फंसते चले आ रहे हैं। इतने में अपने सामने उस ढुलाईवाली को आते देखा। तू ही उन स्त्रियों को कहीं ले गयी है, इतना कहना था कि ढुलाई से मुंह खोलकर नवलकिशोर खिलखिला उठे।

अरे यह क्या ? सब तुम्हारी ही करतूत है! अब मैं समझ गया। कैसा गजब तुमने किया है? ऐसी हंसी मुझे नहीं अच्छी लगती। मालूम होता कि वह तुम्हारी ही बहू थी। अच्छा तो वे गयीं कहां?

वे लोग तो पालकी गाड़ी में बैठी हैं। तुम भी चलो।

नहीं मैं सब हाल सुन लूंगा तब चलूंगा। हां, यह तो कहे, तुम मिरजापुर में कहां से आ निकले?

मिरजापुर नहीं, मैं तो कलकत्ते से, बल्कि मुगलसराय से, तुम्हारे साथ चला आ रहा हूं। तुम जब मुगलसराय में मेरे लिए चक्कर लगाते थे तब मैं ड्योढ़े दर्जे में ऊपरवाले बेंच पर लेटे तुम्हारा तमाशा देख रहा था। फिर मिरजापुर में जब तुम पेट के धंधे में लगे थे, मैं तुम्हाहरे पास से निकल गया पर तुमने न देखा, मैं तुम्हारी गाड़ी में जा बैठा। सोचा कि तुम्हारे आने पर प्रकट होऊंगा। फिर थोड़ा और देख लें, करते-करते यहां तक नौबत पहुंची। अच्छा अब चलो, जो हुआ उसे माफ करो।

यह सुन बंशीधर प्रसन्न हो गये। दोनों मित्रों में बड़े प्रेम से बातचीत होने लगी। बंशीधर बोले, मेरे ऊपर जो कुछ बीती सो बीती, पर वह बेचारी, जो तुम्हारे-से गुनवान के संग पहली ही बार रेल से आ रही थी, बहुत तंग हुई, उसे तो तुमने नाहक रूलाया। बहुत ही डर गयी थी।

नहीं जी! डर किस बात का था? हम-तुम, दोनों गाड़ी में न थे?

हां पर, यदि मैं स्टेशन मास्टर से इत्तिला कर देता तो बखेड़ा खड़ा हो जाता न?

अरे तो क्या, मैं मर थोड़े ही गया था! चार हाथ की दुलाई की बिसात ही कितनी?

इसी तरह बातचीत करते-करते दोनों गाड़ी के पास आये। देखा तो दोनों मित्र-बंधुओं में खूब हँसी हो रही है। जानकी कह रही थी-अरे तुम क्या जानो, इन लोगों की हँसी ऐसी ही होती है। हँसी में किसी के प्राण भी निकल जाएं तो भी इन्हें दया न आवे।

खैर, दोनों मित्र अपनी-अपनी घरवाली को लेकर राजी-खुशी घर पहुंचे और मुझे भी उनकी यह राम कहानी लिखने से छुट्टी मिली ।


दुलाईवाली कहानी – 1907 सरस्वती पत्रिका में  प्रकाशित ।

हिन्दी ज्ञान सागर 

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