Home हिन्दी साहित्य हिन्दी दिवस 14 सितम्बर : राजभाषा हिन्दी का इतिहास

हिन्दी दिवस 14 सितम्बर : राजभाषा हिन्दी का इतिहास

by हिन्दी ज्ञान सागर
210 views
हिन्दी दिवस हम क्यों और कब मनाते हैं ?

हिन्दी दिवस कब और क्यों मनाया जाता है


हिन्दी दिवस भारत देश में मनाया जाता है, हिन्दी भाषा को और समृद्ध, सशक्त बनाने के लिए। यही हिन्दी भाषा जो अधिकांश राज्य में राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित है और देश की राष्ट्रभाषा, मातृभाषा, आधिकारिक भाषा, मानक भाषा का गौरव इस भाषा को प्राप्त है। हालाँकि हिन्दी भाषा आज भी भारत देश के समस्त राज्यों की राजभाषा नहीं बन पायी है, यह विडंबना ही है कि, अपने ही देश में अपनी ही हिंदी भाषा को अनेक संघर्षों से जूझना पड़ रहा है, यह एक कड़वी सच्चाई है।

आज जो हिन्दी दिवस हम मना रहे हैं, इसी संघर्ष को जारी रखने का एक साधन ही है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि, जो सम्मान इस हिन्दी भाषा को मिलना चाहिए था, वह मिल नहीं सका और जितना इस भाषा का गौरव बना हुआ है उसके लिए भी न जाने कितने संघर्ष इस भाषा ने किए हैं तब जाकर यहाँ तक पहुँच सकी है।

बहरहाल, हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में लिखे गए इस लेख में हम इसी राजभाषा हिन्दी भाषा के गौरव, हिन्दी भाषा की संविधान में स्थिति व हिन्दी भाषा के इतिहास पर संक्षिप्त रूप में चर्चा करेंगे । सर्वप्रथम यह जानते हैं आख़िर हिन्दी दिवस कब और क्यों मनाया जाता है ?

हिन्दी दिवस कब मनाया जाता है ?

हम हर वर्ष 14 सितम्बर को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाते हैंइस दिन को मनाने का अर्थ विद्यालय से विश्वविद्यालय तक, समाचार पत्रों के संपादकीय से लेकर अखिल भारतीय संस्थानों तक हिंदी की अस्मिता पर विचार-विमर्श के विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करने के रूप में होता है

यह हिन्दी दिवस आयोजन हर वर्ष 14 सितम्बर को होते हैं लेकिन इन सभी कार्यक्रमों का निष्कर्ष अभी तक ‘ढाक के तीन पात’ वाला ही रहा हैयह कहने में कोई संदेह नहीं है कि भले ही हम तथाकथित अमृतकाल में जी रहे हों किन्तु हिंदी की प्रगति को बाधित करने के लिए कालकूट के कई कलश भरे हुए हैं, जो देववाणी संस्कृत की तरह हिंदी को भी हाशिये पर लाने हेतु सर्व सामर्थ्यवान हैं

प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी ने यह ठीक कहा है कि

“दिवस कमजोर का मनाया जाता है, जैसे- महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवसकभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता

बहरहाल, प्रश्न यह है कि हम 14 सितम्बर को ही ‘हिंदी दिवस’ क्यों मनाते हैं? और, आज के परिप्रेक्ष्य में हिंदी दिवस का मूल उद्देश्य और आवश्यकता क्या है?

​हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है?

वास्तव में, 14 सितम्बर ही वह तिथि है जब 1949. को भारतीय संविधान सभा द्वारा ‘भारत के संविधान’ में हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में शामिल गया थाराजभाषा से यहाँ तात्पर्य संविधान द्वारा सरकारी कामकाज, प्रशासन, संसद और विधान मंडलों की कार्यवाही तथा न्यायिक कार्यों के लिए स्वीकृत भाषा से हैराजभाषा ‘स्टेट लैंग्वेज’ शब्द का हिंदी अनुवाद है, जो संविधान सभा के सदस्य सी. राजगोपालाचारी ने सभा में नेशनल लैंग्वेज के समानंतर प्रयोग किया था

यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि जिस देश में विभिन्न भाषाएँ और लिपियाँ बोली और लिखी जाती हैं, वहाँ एक भाषा को कैसे राजभाषा घोषित किया जा सकता है? और, हिंदी ही भारत की राजभाषा के रूप में क्यों एवं कैसे स्वीकार किया गया?

हिन्दी भाषा का इतिहास

यह सर्वविदित है कि, भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनकी गणना लगभग 121 भाषा के रूप में की गई हैइसके अतिरिक्त, इन भाषाओं की बोलियाँ लगभग असंख्य हैंयही कारण है कि, जब संविधान में एक भाषा को ‘राजभाषा’ के रूप में शामिल करने पर चर्चा हुई तो प्रारम्भ में कोई निष्कर्ष नहीं निकलाइसके विपरीत प्रत्येक सभा सदस्य ने अपनी संबंधित भाषा को राजभाषा बनाने के तर्क दिए किन्तु चर्चा जारी रही और अंत में सभा को देश में क्षेत्रीय व्यापकता की दृष्टि से दो भाषायें राजभाषा के लिए उपयुक्त लगीं

यह भाषायें थीं- हिंदी और अंग्रेजीइसमें कोई संदेह नहीं है कि अंग्रेजी एक भारत की मूल भाषाओं में शामिल नहीं है लेकिन दो सौ वर्षों तक ब्रिटिश राज की पराधीनता के कारण अंग्रेजी देश की सभी भाषाओं में देश की सर्वोपरि और आधिकारिक भाषा बन चुकी थीयही कारण है कि हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी के मत में कई सदस्य समर्थन कर रहे थे

ध्यातव्य है कि, इन सदस्यों में अहिंदी भाषी क्षेत्रों के लोग अधिक थे, जो हिंदी को अंग्रेजी से ज्यादा परायी मानते थेइसके अतिरिक्त एक भाषा और थी, जो सभी भाषाओं से मिश्रित रूप थी।  उसमें संस्कृत की विशुद्धता भी थी तो लोकभाषा की सरसता भी थी।  इसमें अरबी-फ़ारसी के शब्द भी थे तो उर्दू की नजाकत भी थी।  इस भाषा को नाम दिया गया ‘हिन्दुस्तानी’ एवं  देवनागरी और  फ़ारसी दोनों को इसकी लिपि के रूप में स्वीकार किया जाने लगा।

हिन्दी राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित

यह तो तय था कि, अंग्रेजी को राजभाषा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि राजभाषा के लिए उस भाषा का ही चुनाव किया जा सकता है, जो देश के लोक की भाषा हो यानी जो जन-जन की भाषा हो।  इस बीच हिन्दुस्तानी और उर्दू के नाम पर भी गहन चर्चा होती रही, वहीं दूसरी ओर देश के विभाजन के पश्चात पाकिस्तान ने अपनी राजभाषा के रूप में उर्दू की घोषणा की। जिससे भारत में राजभाषा के लिए उर्दू और हिन्दुस्तानी (उर्दू मिली होने के कारण) का घोर विरोध होने लगा।  

स्वतंत्रता से पहले हिंदी और हिन्दुस्तानी के पक्ष में जहाँ क्रमश: 63 और 32 मत पड़े, किन्तु स्वतंत्रता के पश्चात सभा से उर्दू और हिन्दुस्तानी शब्द ही हटा दिए गए।  अब राजभाषा के लिए हिंदी अकेली थी किन्तु निर्विरोध नहीं।  कई प्रांतीय सदस्यों ने अपनी संबंधित मातृभाषा का समर्थन किया और राजभाषा का विषय सभा में सांप्रदायिक टकराव के रूप में दृष्टिगोचर होने लगा।  

अंत में, संविधान सभा के सभापति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सभा सदस्य और भाषाविद् कन्हैयालाल माणीकलाल मुंशी (के. एम.  मुंशी) और नरसिंह गोपालस्वामी आयंगर (एन.  गोपालस्वामी आयंगर) के निर्देशन में 16 सदस्यीय एक प्रारूप समिति का गठन किया, जिसका मुख्य कार्य राजभाषा के निर्धारण और उससे संबंधित सभी प्रारूपों को तैयार करना था।  

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि मुंशी और आयंगर दोनों ही अहिन्दी भाषी क्षेत्र के व्यक्ति थे, ऐसे में हिंदी को राजभाषा मानकर उसके प्रारूपों तैयार करना उनके लिए सहज नहीं था। यद्यपि, दोनों ने इस कार्य को निपुणता से किया और राजभाषा की समस्या के समाधान को जिस प्रकार खोजा, उसे इतिहास में हम ‘मुंशी-आयंगर फ़ॉर्मूला’ के नाम से जानते हैं।  

‘मुंशी-आयंगर फ़ॉर्मूला’ कहता है कि “हिंदी ही भारत की राजभाषा हो सकती है और उसकी लिपि देवनागरी ही होगी।  साथ ही, सभी के जानने और समझने के लिए अंग्रेजी को पन्द्रह वर्षों तक सह-भाषा के रूप में हिंदी के साथ रखा जा सकता है किन्तु सभी अंकों का स्वरूप अंतरराष्ट्रीय ही होगा (जैसे- 1,2,3….. )। ”

हालाँकि, इस बात का भी घोर विरोध हुआ। हिंदी के समर्थक अंकों का भी देवनागरी रूप चाहते थे और अंग्रेजी को सह-भाषा के रूप में अस्वीकार करते थे। वहीं, दूसरी ओर अहिंदी क्षेत्र के लोग इसका समर्थन करते थे और इससे बेहतर विकल्प की बात करते थे।  अंततोगत्वा, ‘मुंशी-आयंगर फ़ॉर्मूला’ वाले इस समझौते पर 14 सितम्बर 1 949 ई. को मुहर लग गई, जो आज भी भारत के संविधान के भाग 17 – राजभाषा शीर्षक से अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित करते हुए उसके विविध प्रावधानों के विषय में अवगत कराते हैं।  यही कारण है कि, हम 14 सितम्बर को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाते हैं।


इन्हें भी पढ़ें –

रामधारी सिंह दिनकर की 10 सर्वश्रेष्ठ कविताएँ  


वर्तमान में राजभाषा हिन्दी की संवैधानिक स्थिति

भारतीय संविधान निर्माताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की माँग को देखते हुए संविधान सभा द्वारा १४ सितम्बर १९४९ को हिन्दी को संघ की राजभाषा स्वीकार करते हुए संविधान के भाग १७ के अनुच्छेद ३४३ से ३५१ तक राजभाषा हिन्दी संबंधी प्रावधान किए गये हैं –

भाग 17 : राजभाषा

अनुच्छेद 343) ​​​संघ की राजभाषा

अनुच्छेद 344) ​​राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति

अनुच्छेद 345) ​​राज्य की राजभाषा या राजभाषाएँ

अनुच्छेद 346) ​​राज्यों की पारस्परिक पत्राचार की भाषा

अनुच्छेद 347) ​​राज्यों की जनसंख्या के आधार पर विशेष उपबन्ध

अनुच्छेद 348) ​​उच्चतम न्यायलय और उच्च न्यायालय में प्रयुक्त भाषा

अनुच्छेद 349) ​​भाषा पर विधि अधिनियमित करने की विशेष प्रक्रिया  

अनुच्छेद 350) ​​व्यथा के निवारण के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा

अनुच्छेद 351) ​​हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश


शोधकर्ता – माधव शर्माहिन्दी दिवस पर लेख माधव शर्मा - शोधकर्ता

Related Posts

Leave a Comment

* By using this form you agree with the storage and handling of your data by this website.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Don`t copy text!