रामधारी सिंह दिनकर जयंती विशेष (114वीं) पर जीवन एवं साहित्यिक परिचय

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रामधारी सिंह दिनकर जयंती विशेष पर उनका जीवन परिचय

रामधारी सिंह दिनकर जी की 114वीं जयंती पर

जीवन परिचय एवं साहित्यिक परिचय


रामधारी सिंह दिनकर जयंती विशेष के दिन आज हम आपको उनके जीवन परिचय से अवगत कराएँगे। रामधारी सिंह दिनकर जी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना धारा तथा प्रगतिवादी काव्य के सशक्त कवि हैं, इन्हें हिंदी साहित्य में ‘समय का सूर्य, अधैर्य का कवि, अनल का कवि भी कहा जाता है। रामधारी सिंह दिनकर जी को ‘उर्वशी’ महाकाव्य के लिए 1972 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया तथा कुरुक्षेत्र 1946 ई. प्रबंध काव्य के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया था। आइए दिनकर जी का व्यक्तित्त्व के बारे में जानते हैं –

रामधारी सिंह दिनकर जयंती विशेष पर उनका जीवन परिचय

दिनकर  जी  विशेष – साहित्यिक उपाधि


जीवनकाल –

जन्म– 23 सितम्बर 1908 ई.

जन्मस्थान – सिमरिया (जिला-मुंगेर)

निधन – 24 अप्रैल 1974 ई. (रामेश्वरम्)

शिक्षा – बी.ए. (इतिहास, राजनीति विज्ञान)

कार्यक्षेत्र – हाईस्कूल के प्राधानाध्यापक, बिहार सरकार के अधीन सब-रजिस्ट्रार, बिहार सरकार के प्रचार विभाग के उपनिदेशक, मुजफ्फरपुर के कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष, राज्यसभा के सदस्य, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति तथा भारत सरकार के हिंदी सलाहकार |


“उठ जाग समय अब शेष नहीं, भारत माँ के शार्दूल बोल!”

आज है रामधारी सिंह दिनकर दिनकर जी की 114 वीं जन्म जयंती, देश को समर्पित एक व्यक्तित्त्व –

“दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” जैसी अमर पंक्ति रचने वाले महान रचनाकार जिसकी कविता पगडण्डी से लेकर संसद तक गूँजी, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी का जन्म 23 सितम्बर 1908 में मुंगेर जिले के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था। दिनकर बचपन से मेधावी तो थे ही साथ ही निर्भीक रचनाकार भी थे।

 

इनके पिता का नाम रविसिंह और माता का नाम मनरूपदेवी था जो एक सामान्य किसान थे, जब ये मात्र 2 वर्ष की अल्पायु के थे तब ही इनके पिता का देहांत हो गया था अतः इनके और इनके भाई-बहनों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी इनकी माता पर आ गयी।

राज्यसभा सांसद और भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति दिनकर का जीवन बड़ा ही संघर्षमय रहा, आइए इनके संघर्षपूर्ण जीवन को इनकी बाल्यावस्था से जानते हैं –

 

बचपन शिक्षा व संघर्ष –

 

रामधारी सिंह दिनकर बचपन से ही मेधावी थे, बचपन में ही इनके पिता रवि सिंह का जब निधन हुआ, तब इनकी आयु मात्र 2 वर्ष की थी और इनकी माता जो विधवा थीं इन्होंने ही इनका पालन पोषण व प्रारम्भिक शिक्षा की देखभाल की। इसके बाद ननुआ (बचपन का नाम) के घर और घर से स्कूल की यात्रा शुरु हो गयी।

सिमरिया घाट से मोकामा घाट(जहाँ स्कूल था) की दूरी लगभग 15 किलोमीटर से अधिक थी। दिनकर सुबह पाँच बजे अपने घर से निकलते और रात आठ बजे स्कूल से लौटकर वापस आते। दिनकर को मानस पढ़ने की भी आदत थी, इसलिए रोज सोने से पहले वो मानस का पाठ किया करते थे।

स्कूल की दूरी में दिनकर को विशालवाहिनी गंगा को भी पार करना पड़ता था। उस वक्त तो आज की तरह न जीपें थीं, न बसें और न ही मैट्रो। अगर कुछ था तो एक नाव, जिसके लिए दिनकर को क्लास आधी ही छोड़ कर आनी पड़ती थी।

 

दिनकर जी के दोनों भाई दूसरों के खेतों में काम करते रहे और यह मन लगाकर पढ़ाई । देखते ही देखते, रामधारी ने एक दिन पटना कॉलेज से इतिहास विषय में बी. ए. (ऑनर्स) की परिक्षा उत्तीर्ण की। स्नातक की शिक्षा के बाद यह फैसला लिया गया कि, दिनकर अब अपने परिवार का बोझ उठायेंगे। लेकिन, तब तक दिनकर भी विवाहित हो चुके थे और उनके दोनों भाई भी। अब एक परिवार तीन से चार छोटी गृहस्थी में तब्दील हो चुका था।

 

दिनकर ने नौकरी करना शुरु कर दिया। पहले दिनकर एक स्कूल के प्रधानाचार्य और फिर सब – रजिस्ट्रार इसी के साथ दिनकर ने कई और नौकरी भी की। जहाँ बड़ा परिवार चलाना मुश्किल हो रहा था, वहीं नौकरी करना भी कम मुश्किल नहीं था। दिनकर जी को नौकरी अपनी लेखनी की वजह से ही मिली तो इसी लेखनी की वजह से उन्हें इन नौकरी में थोड़ी दिक्कत भी झेलनी पड़ी। क्योंकि दिनकर जी अंग्रेजी ताकत का विरोध अपनी कविता के जरिये कर रहे थे –

 

“रोकिए जैसे रुके इन स्वप्न वालों को, स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं ये”। और इसी वजह से दिनकर की नौकरी में चार साल में बाईस तबादले हुए लगभग दो माह में एक तबादला। पर तबादलों की यह काली बदली हिंदी के दिनकर को ढक न सकी। जब 1945 में एक बार नौकरी छोड़ी, तो फिर किसी अंग्रेजी दफ्तर का मुँह नहीं देखा।

 

राज्यसभा के सांसद और कवि का तेवर:

 

दिनकर तीन बार राज्यसभा के सांसद चुने गये, उस वक्त काँग्रेस ही एक मात्र राष्ट्रीय पार्टी थी और दिनकर के प्रिय नेता पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु थे। लेकिन जब चीन से हार के बाद दिनकर का कवि जगा तो उसने उस वक्त के हीरो (नेहरु) को भी नहीं छोडा। उन्होंने कहा- “

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उसको स्वर्ग धीर।

पर फिरा हमें गांडीव गदा, लौटाते अर्जुन भीम वीर॥

कह दे शंकर से आज करें, वो प्रलय नृत्य फिर एक बार।

सारे भारत में गूँज उठे, हर हर बम बम का महोच्चार”॥

 

और जब नेहरु एक कवि सम्मेलन में मुख्य अथिति के तौर पर जा रहे थे, तो वो सीढ़ी पर लड़खड़ा गए तो रामधारी जी ने उन्हें संभालते हुए कहा – ”राजनीति जब भी लडखड़ाई  है तो साहित्य ने ही उसे सम्भाला है।” नेहरु इसे सुनकर हँसने लगे और कोई उत्तर न दे सके।

रामधारी सिंह दिनकर स्वभाव से सौम्य और मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात देश के हित-अहित की आती थी तो वह बेबाक टिप्पणी करने से कतराते नहीं थे। रामधारी सिंह दिनकर ने ये तीन पंक्तियाँ पंडित जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ संसद में सुनाई थी, जिससे देश में भूचाल मच गया था। दिलचस्प बात यह है कि राज्यसभा सदस्य के तौर पर दिनकर का चुनाव पंडित नेहरु ने ही किया था, इसके बावजूद नेहरू की नीतियों की मुखालफत करने से वे नहीं चूके।
देखने में देवता सदृश्य लगता है
बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है।
जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो
समझो उसी ने हमें मारा है॥
1962 में चीन से हार के बाद संसद में दिनकर ने इस कविता का पाठ किया जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू का सिर झुक गया था। यह घटना आज भी भारतीय राजनीती के इतिहास की चुनिंदा क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है।
रे रोक युद्धिष्ठिर को न यहां जाने दे उनको स्वर्गधीर
फिरा दे हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर॥
इसी प्रकार एक बार तो उन्होंने भरी राज्यसभा में नेहरू की ओर इशारा करते हए कहा- "क्या आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा इसलिए बनाया है, ताकि सोलह करोड़ हिंदीभाषियों को रोज अपशब्द सुनाए जा सकें?" यह सुनकर नेहरू सहित सभा में बैठे सभी लोगसन्न रह गए थे। किस्सा 20 जून 1962 का है। उस दिन दिनकर राज्यसभा में खड़े हुए और हिंदी के अपमान को लेकर बहुत सख्त स्वर में बोले। उन्होंने कहा-
देश में जब भी हिंदी को लेकर कोई बात होती है, तो देश के नेतागण ही नहीं बल्कि कथित बुद्धिजीवी भी हिंदी वालों को अपशब्द कहे बिना आगे नहीं बढ़ते। पता नहीं इस परिपाटी का आरम्भ किसने किया है, लेकिन मेरा ख्याल है कि इस परिपाटी को प्रेरणा प्रधानमंत्री से मिली है। पता नहीं, तेरह भाषाओं की क्या किस्मत है कि प्रधानमंत्री ने उनके बारे में कभी कुछ नहीं कहा, किन्तु हिंदी के बारे में उन्होंने आज तक कोई अच्छी बात नहीं कही। मैं और मेरा देश पूछना चाहते हैं कि क्या आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा इसलिए बनाया था ताकि सोलह करोड़ हिंदीभाषियों को रोज अपशब्द सुनाएं? क्या आपको पता भी है कि इसका दुष्परिणाम कितना भयावह होगा?
यह सुनकर पूरी सभा सन्न रह गई। ठसाठस भरी सभा में भी गहरा सन्नाटा छा गया। यह मुर्दा-चुप्पी तोड़ते हुए दिनकर ने फिर कहा- 'मैं इस सभा और खासकर प्रधानमंत्री नेहरू से कहना चाहता हूं कि हिंदी की निंदा करना बंद किया जाए। हिंदी की निंदा से इस देश की आत्मा को गहरी चोट पहुँचती है।'- विकिपीडिया

रामधारी सिंह दिनकर जी का साहित्यिक परिचय  –

रामधारी सिंह दिनकर जयंती विशेष

रामधारी सिंह दिनकर की रचना – परशुराम की प्रतीक्षा

रामधारी सिंह दिनकर जयंती विशेष

रामधारी सिंह दिनकर की रचना – कुरुक्षेत्र

दिनकर हिंदी साहित्य जगत् में मुख्य रूप से कवि हैं, साथ ही एक सशक्त निबंधकार भी हैं, संस्कृत के चार अध्याय, रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, रेणुका, हुंकार आदि साहित्य जगत् को समर्पित इनकी बहुमूल्य रचनाएँ हैं।

 

दिनकर जी मूलतः ओजपूर्ण कवि हैं, उर्वशी रचना के अतिरिक्त सभी रचनाएँ वीर रस से सम्बंधित हैं। कवि भूषण के बाद इन्हें वीर रस का सर्वोच्च कवि माना जाता है। ‘उर्वशी’ काव्य रचना के लिए दिनकर जी को 1972 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था, और इनकी गद्य रचना ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया।


रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रमुख रचनाएँ –

रामधारी सिंह दिनकर जयंती विशेष पर उनकी रचनाएँ

रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएँ

 

काव्य रचनाएँ –

  • बारदोली-विजय संदेश (1928)
  • प्रणभंग (1929)
  • रेणुका (1935)
  • हुंकार (1938)
  • रसवन्ती (1939)
  • द्वंद्वगीत (1940)
  • कुरूक्षेत्र (1946)
  • धूप-छाँह (1947)
  • सामधेनी (1947)
  • बापू (1947)
  • इतिहास के आँसू (1951)
  • धूप और धुआँ (1951)
  • मिर्च का मज़ा (1951)
  • रश्मिरथी (1952)
  • दिल्ली (1954)
  • नीम के पत्ते (1954)
  • नील कुसुम (1955)
  • सूरज का ब्याह (1955)
  • चक्रवाल (1956)
  • कवि-श्री (1957)
  • सीपी और शंख (1957)
  • नये सुभाषित (1957)
  • लोकप्रिय कवि दिनकर (1960)
  • उर्वशी (1961)
  • परशुराम की प्रतीक्षा (1963)
  • आत्मा की आँखें (1964)
  • कोयला और कवित्व (1964)
  • मृत्ति-तिलक (1964) और
  • दिनकर की सूक्तियाँ (1964)
  • हारे को हरिनाम (1970)
  • संचियता (1973)
  • दिनकर के गीत (1973)
  • रश्मिलोक (1974)
  • उर्वशी तथा अन्य शृंगारिक कविताएँ (1974)

गद्य रचनाएँ –

  • मिट्टी की ओर 1946
  • चित्तौड़ का साका 1948
  • अर्धनारीश्वर 1952
  • रेती के फूल 1954
  • हमारी सांस्कृतिक एकता 1955
  • भारत की सांस्कृतिक कहानी 1955
  • संस्कृति के चार अध्याय 1956
  • उजली आग 1956
  • देश-विदेश 1957
  • राष्ट्र-भाषा और राष्ट्रीय एकता 1955
  • काव्य की भूमिका 1958
  • पन्त-प्रसाद और मैथिलीशरण 1958
  • वेणुवन 1958
  • धर्म, नैतिकता और विज्ञान 1969
  • वट-पीपल 1961
  • लोकदेव नेहरू 1965
  • शुद्ध कविता की खोज 1966
  • साहित्य-मुखी 1968
  • राष्ट्रभाषा आंदोलन और गांधीजी 1968
  • हे राम! 1968
  • संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ 1970
  • भारतीय एकता 1971
  • मेरी यात्राएँ 1971
  • दिनकर की डायरी 1973
  • चेतना की शिला 1973
  • विवाह की मुसीबतें 1973
  • आधुनिकता बोध 1973

दिनकर जी की रामेश्वरम में मृत्यु और रश्मिरथी का पाठ:

रामधारी सिंह दिनकर को जब लगा कि, अब उनके जीवन में मृत्यु के अलावा कुछ और शेष नहीं रहा तो उन्होंने निश्चय किया कि, अब उन्हें अपने घर से कहीं दूर चलना चाहिए तो वह दक्षिण भारत की तरफ चल दिए। यहाँ वह पहले कन्याकुमारी आए और अपनी प्रिय रचना ‘रश्मिरथी’ का पाठ करने लगे, वहाँ यह खबर हर जगह फैल गयी और भारी मात्रा में लोगों की भीड़ लगनी शुरु हो गयी।

इसके बाद वह रामेश्वरम पँहुचे और सागर के समीप खड़े होकर सागर को ही कुछ कविताएँ सुनाने लगे। अंत में उन्होंने सागर से कहा कि, मैंने तुम्हें और तुम्हारे दामाद (विष्णु) को इतनी प्यारी कविता सुनाईं। अब तुम मुझे मेरी दक्षिणा दे दो और मैं तुमसे दक्षिणा के रुप में मौत मांगता हूँ। कहते हैं, उसी रात (24 अप्रैल1974) रामेश्वरम में ही इनका निधन हो गया। माँ हिंदी को समर्पित एक सूर्य दैहिक रूप में सदैव के लिए अस्त हो गया, हिंदी साहित्य के इस अनमोल कवि को यह संसार सदैव याद रखेगा।

माधव शर्मा / हिन्दी ज्ञान सागर

इन्हें भी पढ़ें – प्रेमचंद जी का जीवन एवं साहित्यिक परिचय 

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