रामधारी सिंह दिनकर की 10 लोकप्रिय कविताएँ

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रामधारी सिंह दिनकर की 10 लोकप्रिय कविताएँ

रामधारी सिंह दिनकर की 10 लोकप्रिय कविताएँ

(Ramdhari Singh Dinkar ji Famous Poetries)

रामधारी सिंह दिनकर की वे कविताएँ जो जीवन में हमें सीख देते हैं, प्रेरणा देते हैं, उन चुनिंदा कविताओं को इस लेख में संगृहीत करने का लघु प्रयास किया गया है, आप जानते हैं दिनकर जी ओज एवं वीर रस के प्रख्यात कवि हैं, हिन्दी साहित्य जगत् इन्हें राष्ट्र कवि के रूप में मानता है, उनकी कवितायें मन में अद्भुत साहस पैदा करती हैं, मन को प्रेरणा देती हैं, संघर्ष करते रहने और उस पर विजय पाने को उत्प्रेरित करती रहती हैं, ऐसी कुछ दिनकर की चुनिंदा लेकिन बेहतरीन कविताएँ इस लेख में हम पढ़ेंगे एवं उनसे सीख लेंगे और उसे अपने जीवन में अपनाएँ ।


रामधारी सिंह दिनकर की 10 लोकप्रिय कविताएँ


मंज़िल दूर नहीं है – रामधारी सिंह दिनकर

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य प्रकाश तुम्हारा 

लिखा जा चुका अनंत अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।

जिस मिट्टी ने लहू पिया वह फूल खिलाएगी ही

अंबर पर बन घन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा ।

और अधिक ले जाँच देवता इतना क्रूर नहीं है

थक कर बैठ गए क्यों भाई! मंज़िल दूर नहीं है ।।


रह जाता कोई अर्थ नहीं – रामधारी सिंह दिनकर की कविताएं

रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ

रह जाता कोई अर्थ नहीं

 

 

 

 

 

 

 

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,

तब सुख के मिले समन्दर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,

फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,

फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहां,

फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।

मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,

फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,

फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।। …!!


पढ़ें: दिनकर जी का जीवन परिचय 


रश्मिरथी गीति काव्य से… (काव्यांश) ✍️

ऊँच – नीच का भेद न माने वही श्रेष्ठ ज्ञानी है,
 
दया-धर्म जिसमें हो सबसे, वही पूज्य प्राणी है।
 
क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग
 
सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है , हो जिसमें तप – त्याग।
 
तेजस्वी सम्मान खोजते, नहीं गोत्र बतला के
 
पाते हैं जग में प्रशस्ति, अपना करतब दिखला के।
 
हीन मूल की ओर देख, जग गलत कहे या ठीक
 
वीर खींच कर ही रहते हैं, इतिहासों में लीक !
 
 
( प्रशस्ति – प्रशंसा ) ( लीक – परंपरा )
 
#रामधारी_सिंह_दिनकर जी

रश्मिरथी गीतिकाव्य से… (काव्यांश) ✍️

 
जीवन के परम ध्येय सुख को, सारा समाज अपनाता है
 
देखना यही है, कौन वहाँ तक, किस प्रकार से जाता है।
 
है धर्म पहुँचना नहीं , धर्म तो जीवन भर चलने में है
 
फैला कर पथ पर स्निग्ध ज्योति, दीपक समान जलने में है।
 
यदि कहें विजय, तो विजय प्राप्त हो जाती परतापी को भी
 
सत्य ही पुत्र, दारा, धन, जान, मिल जाते हैं पापी को भी।
 
हो जिसे धर्म से प्रेम कभी, वह कुत्सित कर्म करेगा क्या ?
 
बर्बर कराल, द्रंष्टी बन कर, मारेगा और मरेगा क्या ?
 
पर है मनुज के भाग्य, अभी तक भी, खोटे के खोटे हैं
 
हम बड़े बहुत बाहर, मगर भीतर छोटे के छोटे हैं।
 
साधन की मूल सिद्धि पर जब, टकटकी हमारी लगती है
 
फिर विजय छोड़, भावना और कोई न युद्ध में जगती है।
 
जब लोभ सिद्धि का आँखों पर,माँड़ी बन कर छा जाता है
 
तब वह मनुष्य से बड़े-बड़े दुश्चित्य कृत्य करवाता है।
 
फिर क्या विस्मय, कौरव – पांडव भी नहीं धर्म के साथ रहे
 
जो रंग युद्ध का है उससे, उनके भी अलग न हाथ रहे।
 
दोनों ने कालिख धूमि, शीश पर जय तिलक लगाने को
 
सत्पथ से दोनों डिगे, दौड़ कर विजय-बिंद तक जाने को।
 
रामधारी सिंह दिनकर जी।
 
( बर्बर = असभ्य, कराल=भयानक, दारा = पत्नी, दुश्चित्य = बुरे मन का स्वभाव वाला ) स्निग्ध = स्नेह युक्त, कराल=भयानक )

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।


सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है ।
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।।

जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली ।
जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली ।।

जनता ? हाँ, लम्बी-बडी जीभ की वही कसम
“जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।”
“सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है ?”
‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है ?”

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में ।
अथवा कोई दूधमुँही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में ।।

लेकिन होता भूडोल, बवण्डर उठते हैं
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है ।
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है  ।।

हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है ।
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है  ।।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अन्धकार
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं ।
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं ।।

सब से विराट जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो ।
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो ।।

आरती लिए तू किसे ढूँढ़ता है मूरख
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में ?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में ।।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं
धूसरता सोने से शृँगार सजाती है ।
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।।


कलम, आज उनकी जय बोल –

रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल।अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल ।।
कृष्ण की चेतावनी

वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!


रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;
आज उठता और कल फिर फूट जाता है;
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,
और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
“रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।”


कलम या कि तलवार

दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार ।अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान ।कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वालीपैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे ।एक भेद है और वहां निर्भय होते नर -नारी,
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी ।जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
बादल में बिजली होती, होते दिमाग में गोले ।जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार,
क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार ।।- रामधारी सिंह दिनकर

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