शेखर एक जीवनी उपन्यास की समीक्षा एवं सारांश – अज्ञेय

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शेखर एक जीवनी उपन्यास की तात्विक समीक्षा

शेखर एक जीवनी उपन्यास की समीक्षा

शेखर एक जीवनी ‘सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी द्वारा रचित एक ‘मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास’ है , जिसे पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) शैली में लिखा गया है, इस उपन्यास पर रोमाँ रोलाँ के ‘ज्यां क्रिस्ताफ’ का प्रभाव है । इसके दो भाग हैं । शेखर एक जीवनी उपन्यास के प्रथम भाग का नाम ‘उत्थान’ है और इसका रचनाकाल 1941 ई० है । दूसरे भाग का नाम ‘उत्कर्ष’ है जिसका रचनाकाल 1944 ई० है । इस उपन्यास के प्रथम भाग के भी चार (4) खंड हैं, जिनको विभाजित किया गया है – उषा और ईश्वर, बीज और अंकुर, प्रकृति और पुरुष तथा पुरुष और परिस्थिति, इस चार खण्डों में । ऐसे ही दूसरे भाग के भी चार (4) खंड हैं, जो विभाजित हैं – पुरुष और परिस्थिति, बंधन और जिज्ञासा, शशि और शेखर तथा धागे, रस्सियाँ, गुंझर, इन चार खण्डों में ।

भूमिका –

शेखर एक जीवनी उपन्यास अज्ञेय जी द्वारा लिखित एवं इनका सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला उपन्यास है, इस उपन्यास का नायक जो शेखर है वह स्वयं अज्ञेय हैं या कोई और व्यक्ति यह हमेशा कौतूहल का विषय रहा है, कुछ लोग मानते हैं कि, यह अज्ञेय की ही आत्मकथात्मक कृति है । लेकिन इस उपन्यास की भूमिका में अज्ञेय स्वयं कहते हैं कि, ‘आत्म-घटित ही आत्मानुभूत नहीं होता, पर-घटित भी आत्मानुभूत हो सकता है, यदि हममें सामर्थ्य है कि, हम उसके प्रति खुले रह सकें ।’

शेखर में मेरापन कुछ अधिक है लेकिन यह कथा ऐसी नहीं है कि, इसे एक आदमी की निजी बात कहा जा सके । अज्ञेय इसे अपने युग और समाज का प्रतिबिम्ब मानते हैं । इसमें मेरा युग और समाज बोलता है, वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है । बहु आयामी और संश्लिष्ट चरित्रों के साथ अपने समय-समाज और उनके बीच अपनी अस्मिता को आकार देते व्यक्ति की वेदना को तीव्र और आवेगमयी भावात्मकता के साथ अंकित करते इस उपन्यास के नायक शेखर के बारे अज्ञेय जी की टिपण्णी है –

‘’शेखर कोई बड़ा आदमी नहीं है, वह अच्छा आदमी भी नहीं है । लेकिन वह मानवता के संचित अनुभव के प्रकाश में ईमानदारी से अपने को पहचानने की कोशिश कर रहा है, उसके साथ चलकर आप पाएंगे कि, आपके भीतर भी कहीं शेखर है, जो जागरूक, स्वतंत्र और ईमानदार है घोर ईमानदार ।

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शेखर एक जीवनी के पात्र

शेखर –

‘शेखर एक जीवनी’ उपन्यास का नायक है । शेखर का व्यक्तित्त्व अहंता, भय और सेक्स इन्हीं 3 (तीन) धरातलों पर सृजित हुआ है । विद्रोहात्मक उसके व्यक्तित्त्व का अभिन्न अंग है वह घोर स्वाभिमानी, अंतिम सीमा तक ईमानदार, निर्भीक, और जिज्ञासु है ।

सरस्वती –

‘शेखर एक जीवनी’ उपन्यास की प्रमुख पात्रा । शेखर को नारी का प्रथम स्नेह सरस्वती से मिलता है और वह उसे बहन से सरस्वती और सरस्वती से ‘सरस’ महसूस करता है । शेखर के जीवन में सरस्वती के अतिरिक्त शशि, शीला, प्रतिभा, शांति इत्यादि नारी पात्र आती हैं ।

प्रतिभा –

शेखर की खेल सखी जिससे शेखर प्यार करता है । समवयस्का बालिका के रूप में शेखर का दूसरा परिचय प्रतिभा से ही होता है ।

शारदा –

शारदा वह नारी पात्र है, जो शेखर की काम भावना का वास्तविक आलंबन बनती है । कैशोर्य प्रेम का इतना यथार्थ और मार्मिक चित्रण जो शारदा और शेखर के प्रेम में हुआ है, अन्यत्र दुर्लभ है ।

शशि –

‘शेखर एक जीवनी’ उपन्यास की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्त्री-चरित्र, असाधारण चरित्र जो शेखर की जीवन शक्ति बनती है । शशि के आग्रह पर शेखर एम. ए. करता है, कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेता है, जेल जाने को बाध्य होता है । शेखर शशि से भावनात्मक रूप से जुड़ता है । शशि की शादी अन्यत्र हो जाती है, शशि का पति उसे दुश्चरित्र घोषित कर जब घर से निकाल देता है तो शेखर उसका संरक्षक बनता है ।

मणिका –

धनी, लेक्चरार (शेखर के कॉलेज की) शराबी, प्रखर प्रतिभा की धनी पर असंयत चरित्र ।

हरिदत्त –

शेखर के पिता, अनुशासनप्रिय, शेखर पिता की प्रताड़ना का शिकार, पत्नी की मृत्यु के बाद अहं, दबदबापन ख़त्म और टूटन की कगार पर ।

अन्य पात्र –

बाबा मदन सिंह, मोहसिन और राम जी (बंदी पात्र), विद्याभूषण (शेखर का मित्र), हीथ, रामेश्वर, अमोलकराम, स्वामी हरिहरानंद, रामकृष्ण तथा कुमार (मद्रास में शेखर का समलैंगिक मित्र)

‘शेखर एक जीवनी’ उपन्यास की समीक्षा

शेखर एक जीवनी

शेखर एक जीवनी उपन्यास

शेखर : एक जीवनी मूलतः एक रूमानी कृति है । छायावादी चेतना का पूरा विस्तार शेखर के जीवन में देखा जा सकता है । वह जिज्ञासु है और जिज्ञासा ही उसके आरंभिक जीवन की पारिवारिक स्थितियों में उसे परिवार से अलग बनाए रखती हैं । मगर यह जिज्ञासा व्यक्ति-केन्द्रित है, वस्तु-केन्द्रित नहीं । ठीक वैसी ही जैसे कि, छायावादियों की जिज्ञासा है ।

सारी कृति पढ़ने के बाद कोई एक सत्य उभरकर आता है या उभारकर रखा गया प्रतीत होता है तो, वह है शेखर का जीवन । शेखर का पूरा जीवन नहीं उसका आतंरिक जीवन या उसकी रूमानी संवेदना जिसमें सभी पात्र धीरे-धीरे ढल जाते हैं और उस संवेदना को ज्ञानिय देते हुए उसे रूप भी दे जाते हैं ।

वह छायावादियों के समान ही जगह-जगह दर्द की महिमा बखारने लगता है – दुःख संसर्ग जन्य है, वह उदात्त और शोधक भी है । दुःख का संसर्ग परवर्ती को भी शुद्ध और उदात्त बनाता है ।

(प्रमुख उद्धरण ध्यान देने योग्य ):

‘’कुछ ऐसा ही ज्ञान वहाँ रहते हुए शेखर के भीतर से प्रस्फुटित हो रहा था, तभी उसने निश्चय किया कि, वह वहाँ से न जाकर वहीं दुःख के आँचल में विश्राम करेगा ।‘’ (भाग-2, पृ० 30)

‘’विश्वास…. दर्द से भी बड़ा विश्वास… शायद हो । अपने में विश्वास यानी अहंकार । क्या वह उद्देश्य हो ? (भाग 2, पृ० 112)

अपने भीतर जो सत्य तुमने पाया है, वह दूसरों को दे सकते हो ? (पृ० 112)

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि, शेखर की आस्था का विषय समाज नहीं है, युग नहीं है, वरन् उसके भीतर का सत्य है । मगर अपने भीतर का सत्य तो विशाल और विराट भी हो सकता है क्योंकि, उसनें बहुत कुछ समा सकता है । मगर यहाँ ऐसा नहीं है । भीतर का सत्य है दर्द, और यह दर्द भी समाज का नहीं है, व्यक्ति का है, निजी और एकाकी है ।

वही छायावादी चेतना का विस्तार, जानी-पहचानी रूमानी चेतना जो दर्द, सौन्दर्य, प्रणय और वासना के नामों से अलग-अलग जगह याद की गई है ।

पात्रों की स्थिति

पात्रों की स्थिति, घटनाओं की संरचना को देखो तो शेखर की चेतना का यह मूल स्वर और भी स्पष्ट हो जाता है । यहाँ कोई पात्र अपने लिए नहीं जीता, किसी का अपना व्यक्तित्त्व नहीं है, सभी शेखर के लिए आते हैं, शेखर के लिए छिप जाते हैं या मर जाते हैं ।

लगता है शेखर किसी समाज में नहीं रहता, उसके आसपास क्या हो रहा है, कैसा हो रहा है, वह नहीं जानता, वह जानना नहीं चाहता । माता से वह घृणा करता है, पिता के प्रति आकर्षित है मगर मुख्य बात यह है कि, उपन्यास में आने वाली माँ पात्रों के अलावा वह सभी नारी-पात्रों के प्रति आकर्षित होता है, उन्हें अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है – चाहे वह उसकी बहन हो या नौकरानी, असाध्य रोग से पीड़ित है या किसी दूसरे की पत्नी । वह अपनी इस उच्छृंखलता को फिलास्फाइज (उपदेश) करता है, एक ऐसे गंभीर कोण पर कि, कृति की रचनात्मकता संदिग्ध हो उठती है ।

इसीलिए शशि से वह नया प्रेम करने की अनुमति पा लेता है – उसे लगता है शशि ने मरते-मरते उसे यह अनुमति दे दी है –

‘’शशि का सारा शरीर निःस्पंद जड़ हो गया था सिवाय आँखों के –

‘’कभी, एक दिन क्षण-भर के आदर्श माने जाने का सौभाग्य हर किसी को मिल जाता है, पर चिरंतन आदर्श कोई नहीं है, न हो सकता है । इसलिए जो अपने मित्र के प्रति चिरंतन सच्चा है, वह अवश्य किसी आदर्श से च्युत है और जो आदर्श के प्रति निष्ठावान है, वह अवश्य कभी-न-कभी प्रिय को झर जाने देगा.. साधारण मानव और कलाकार–विद्रोही में यही अंतर है.. मैं नहीं चाहती कि, तुम मानव कम होओ, शेखर, किन्तु अगर तुम में उसकी क्षमता है, तो उससे बड़े होने की अनुमति, स्वाधीनता मैं तुम्हें सहर्ष देती हूँ ।‘’

और इस ‘अनुमति, स्वाधीनता से थोड़ी देर पहले ही गौरा पत्र में लिखती है – ‘शशि के स्वास्थ्य की मुझे बहुत चिंता है, चिंता की बात न होती तो तुम भला लिखते ? मैं शुश्रूषा के लिए आ जाऊं ? माँ ने नहीं पूछा, पर तुम कहोगे तो जरूर आ जाऊँगी चाहे जो हो –

‘शेखर के जीवनी’ के पहले भाग में ‘शेखर’ सोचता है – ‘शेखर’ के मन में यह बिल्कुल स्पष्ट था कि, यदि वह शारदा से प्रेम करता है, तो शारदा के अतिरिक्त किसी भी स्त्री का विचार भी उसे नहीं होना चाहिए । और यही भी उसे स्पष्ट दिख रहा था कि, ये विचार बराबर उसके मन में आते रहे हैं ।

और फिर ‘व्हाट आल मैरिड पीपल शुड नो’ पुस्तक पढने पर उसकी प्रतिक्रया होती है – और हाँ, सरस्वती की लज्जा, शांति की आंसू, सावित्री का मौन, शशि का आग्रह, शारदा का कम्पन सब एक ही सूत्र में गुँथ गए, स्पष्ट हो गए, समझ आ गए.. इन सबकी गति एक ही ओर है, एक ही घृणित पाप-कर्म की ओर जिसे उसके माता-पिता ने किया है ।

ऊपर के उद्धरणों से शेखर के एक बुनियादी दुर्बलता स्पष्ट होती है – वह प्रेम करता है, असंख्य नारियों से प्रेम करना चाहता है मगर भोग करने में असमर्थ है । यही असमर्थता, पौरुषहीनता की ग्रंथी उसके उच्छृंखल प्रणय और क्रान्ति को जोडती है ।

प्रणय का आकर्षण सहज है और क्रान्ति की भावना पौरुषहीनता का आवरण बन जाती है, गोया कि भोग की असमर्थता ही अपने आपको छिपाने के लिए विद्रोही चेतना का रूप धारण कर लेती है ।

शेखर की चारित्रिक विशेषता

दंभ शेखर की प्रधान चारित्रिक विशेषता है । वह जो है, उसे स्वीकार नहीं करना चाहता । वह अपनी असलियत सभी से छिपाना चाहता है । प्रेम करता है, करना चाहता है, मगर यह व्यवस्था करता है कि, प्रेमिका खुद उसके पास आ जाए । वह अहिंसावादी है मगर जीवन में हिंसा उसे प्रभावित नहीं करती । यहाँ हिंसा का प्रयोग एक व्यापक अर्थ में कर रहा हूँ । एक ओर तो शशि, जो विवाहिता नारी हैं पति के साथ रहती है, जो उसके पास आकर रात भर रह जाती है तो उसे एक बार भी यह चिंता नहीं होती कि, उसके घरवाले क्या सोचते होंगे और जब शशि को उसका पति तथा सास-ससुर निकाल देते हैं तो वह उसके पति के पास सफाई देने जाता है । दुनिया भर के दर्शन की बातें बधारने वाला व्यक्ति इतना नहीं जानता कि, ऐसा होने पर पति पत्नी को ग्रहण नहीं कर सकता । शेखर को शशि के पति और सास-ससुर के सामने पश्चाताप नहीं होता वरन् वह यह आभास देता है गोया कि, कुछ हुआ ही नहीं । इतना ही नहीं इस पूरी घटना में उपन्यासकार पूरी कोशिश करता है कि, पाठक की सहानुभूति शशि के पति और ससुरालवालों के साथ न हों, शशि और शेखर के साथ हो ।

रचनात्मकता ली दृष्टि से यह अंश अत्यंत दुर्बल है क्योंकि, उपन्यासकार शेखर एवं शशि से तादात्म्य का अनुभव करता हुआ पाठक की सहज प्रत्याशा की प्रतिक्रिया की उपेक्षा कर एक गलत प्रभाव पैदा करने की कोशिश करता है ।

यहाँ सहसा शेखर की माँ का यह कथन याद आता है कि, ‘मुझे तो उस पर भी विश्वास नहीं होता । वह शेखर को आरंभ से ही अविश्वास की नजर से देखतीं है और इस बात को शेखर के सामने स्पष्ट कह देती हैं । शेखर की माँ उसकी दुखती रग पर हाथ रख देती है, उसके दंभ को पहचान लेती है, इसीलिए शेखर उससे घृणा करता है और यह बात छिपाता नहीं, बार-बार कहता है क्योंकि उसकी चोटी माँ ही पकड़ती है और इसलिए वह जिंदगी भर उससे समझौता नहीं कर सकता, उसके मरने की खबर पाकर भी उदासीन-सा बना रहता है ।

यह बातें विश्वसनीय लग सकतीं थीं अगर शेखर एक अस्तित्ववादी नायक होता, गार्दा,सार्त्रा के दर्शन का अनुसरण करता । मगर ऐसा नहीं है । वह जीवन में एक व्यापक अर्थ की तलाश करने को व्याकुल नजर आता है मगर सक्रिय नहीं । यही उसके दंभ का मूल है । वह क्रांतिकारी बनना चाहता है, बन भी जाता है मगर क्रान्ति में आस्था होने के कारण नहीं, वरन् मजबूरी में । वह पकड़ा जाता है मगर निर्दोष है, वह अहिंसावादी है । इसलिए विद्रोह की क्रान्ति उसे दर्शन के रूप में ग्राह्य नहीं है । इसलिए वह अपने आपको विद्रोह के प्रति समर्पित भी नहीं कर पाता ।

शशि के साथ रहता है और क्रांतिकारियों का साथ देता है, इसलिए कि, ऐसा करने पर उसकी रोजी-रोटी की समस्या हल हो जाती है । इतना ही नहीं, वह शशि के साथ रहते हुए भी ईमानदार नहीं है, वह उसे बहुत देर तक बहन समझता है या बहन समझने का नाटक करता है क्योंकि, उसमें साहस नहीं है । वह जो चाहता है वह करने की हिम्मत नहीं है । यदि वह स्पष्ट रूप से कहे कि, वह संसार के किसी मूल्य को, किसी परम्परा को, किसी बंधन को स्वीकार नहीं करता, यदि वह स्वतन्त्र निरपेक्ष व्यक्ति के रूप में जीवित रहने की पद्धति अपनाता तो कृति में यह दुर्बलता नहीं रहती । लेखक किसी निर्णय पर नहीं पहुँचा । जो लिखता है, घटनाओं, विचारों आदि का ताना-बाना बुनता है, उसमें सर्वत्र यही अनिश्चय दिखाई देता है ।

यह अनिश्चय तर्क की सीमा के कारण नहीं है, रोमांटिक प्रवृत्ति के कारण है, खुलकर रोमांटिक प्रवृत्ति को स्वीकार करने की दिक्कत न होने के कारण है । उसकी मूल चेतना रोमांटिक है मगर वह यह छिपाना नहीं चाहता, इस सत्य को दिखाना चाहता है मगर वह इस सत्य को छिपा नहीं पाता ।

शेखर एक जीवनी’ में क्रांति का स्वर

‘शेखर एक जीवनी’ उपन्यास कृति की चेतना के दो आयाम हैं- एक क्रान्ति की भावना, दूसरा बचपन और किशोर जीवन का वर्णन । क्रान्ति की भावना दुर्बल है, आस्थाहीन है, सजीव नहीं है, आरोपित सी लगती है और कहीं-कहीं असंगत और हास्यापद भी । मगर बचपन एवं किशोर-जीवन के चित्रण में लेखक ने कुशलता दिखलाई है । शेखर के मन में एक बच्चे के रूप में तरह-तरह के सवाल पैदा होते हैं मगर, कुछ का उत्तर मिलता है और प्रायः टाल दिया जाता है ।

लेखक ने सर्वत्र यह दिखाने की कोशिश की है कि, उसके साथ सभी अन्याय करते हैं, वह माँ को कभी क्षमा नहीं कर पाता । बहन के प्रति उसका प्रेम अस्वाभाविक की सीमा का स्पर्श करता है और इस विषय में लेखक की व्यंजना स्पष्ट है । पिता से वह कुछ प्रभावित है, और भाई तो जैसे उसके हैं ही नहीं, फिर भी लेखक उनके होने की सूचना देता है, इस प्रकार शुरू से ही शेखर एक अहंवादी प्रवृत्ति का शिकार है जिसमें उसके आसपास का हर व्यक्ति उससे छोटा दिखाया गया है, उसके सामने बौना दिखाया गया है और यहाँ उपन्याकार की रचनात्मकता का एक अन्य पक्ष सामने आता है । वह शेखर को बड़ा व्यक्ति नहीं दिखा सकता है, क्योंकि उसमें वैसा कुछ है नहीं, इसलिए वह उसके आसपास के व्यक्तियों को बौना बना देता है, उन्हें अन्यायी और छोटे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है ।

बचपन में शेखर की रूमानियत, आवारापन और प्रकृति-प्रेम के रूप में प्रकट होती है । लेखक ने जगह-जगह प्रकृति के सुन्दर चित्र खींचे हैं । लेखक का कवित्व अनेक स्थानों पर उपन्यास में बिखरा मिलता है, वैसे ही जैसे प्रसाद के नाटकों में उनका व्यक्तित्व सहसा व्यक्त हो आता है । मगर प्रकृति, प्रेम, कवित्व, चिंतन के सूत्र, प्रणय, क्रांतिकारिता आदि के चित्रण में कहीं भी सामाजिकता की गंध नहीं आती – इनमें से कोई भी बात समाज से जोड़कर नहीं दिखाई जाती, हर चीज शेखर के व्यक्तित्व में घुलमिल जाती है ।

लगता है कि, एक अकेला व्यक्ति है, जैसा चाहता है, जीता रहता है, जो चाहे करता है, कहीं कोई बाधा या परेशानी नहीं है – समाज नाम की कोई चीज यथार्थतरु है ही नहीं । बाल मनोविज्ञान का चित्रण और हिंसक क्रान्ति की तैयारी का चित्रण हवाई प्रतीत होते हिं । लगता है, एक फैंटेसी है, नायक या उपन्यासकार एक दिवास्वप्न का वर्णन कर रहा है । शेखर की स्थिति नदी के द्वीप-सी है, उसे कहीं समाज का जल छू नहीं पाता और यही उसके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी दुर्बलता है ।

लेखक ने स्थान-स्थान पर जो चित्रण किया है उसकी स्थिति उन कविताओं-सी है जो लेखक ने उद्धृत की हैं । वे पंक्तियाँ उसी प्रकार उपन्यास के भीतर से पैदा नहीं होतीं जैसे कि, उद्धृत पंक्तियाँ उपन्यास के भीतर से नहीं जन्मतीं, मगर वे अलग से अपने आप में सार्थक लगती हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि, उपन्यास टुकड़ों में, यत्र-तत्र बिखरे हुए है, एक प्रभावात्मकता लिए हुए है, यद्यपि वे टुकड़े पूरे उपन्यास के सन्दर्भ में सार्थक और उससे संपृक्त नहीं हैं ।

लेखक प्रत्येक खंड को अपने आप में पूर्ण मानता है मगर प्रत्येक खंड में भी कुछ अंश पूर्ण-से लगते हैं। किशोर-मन की ग्रंथियाँ, आतंकवादी भावना और स्वच्छंद प्रणय की कामना उपन्यास में प्रस्तुत तो की गई हैं मगर उनमें अन्विति का अभाव है और लेखक इस सीमा के प्रति सजग है ।

एक व्यक्ति की स्थिति त्रिशंकु-सी है क्योंकि, वह न तो मानस की पूर्ण उपेक्षा कर पाती है, न ही उस पर आस्था व्यक्त करती है, न ही आधुनिकता से जुड़ पाती है और न ही उससे उदासीन हो पाती है, न ही सामाजिकता से मुक्त रह सकती है, न ही सामाजिकता का तिरस्कार कर पाती है, न ही व्यक्तिवादिता से पूर्णतः जुड़ पाती है और न ही उसे नजरअंदाज कर कर पाती है । मगर इस अनिश्चयात्मक मनोभूमि के कारण ही इसका एक ऐतिहासिक महत्त्व भी है ।

जब समाज में धीरे-धीरे व्यापक अनास्था और विद्रोह के भाव अंकुरित हो रहे थे तो इस कृति ने उन्हें वाणी दी- एक शक्तिशाली वाणी । विचित्र बात यह है कि, भाषा कथ्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली प्रतीत होती है । आज की समीक्षा धारणा के अनुसार यह असंगत लग सकता है लेकिन वास्यतविकता यही है । कारण यह है कि, अंशों में भाषा और कथ्य समान शक्तियुक्त प्रतीत होते हैं मगर क्योंकि कथ्य में अन्विति की स्थापना नहीं हो पाती इसलिए भाषिक संरचना के स्तर पर भी अन्विति का भाव पैदा हो जाता है ।

निष्कर्ष

‘शेखर एक जीवनी’ कृति पर शेखर इतना छाया हुआ है कि, और कुछ भी उभरकर नहीं आ पाता । सजग रूप में शेखर के चरित्र को उभारने के साथ-साथ अन्य महत्त्वपूर्ण पात्रों के चरित्र को गिराने का प्रयास भी दिखाई देता है । शेखर के अतिरिक्त सबसे प्रभावशाली पात्र है शशि । मगर उसे दो स्थलों पर हास्यापद बनाया गया है – एक तो तब जब वह भाषण देते हुए अपने जीवन की घटनाओं की सार्थकता बयान करने की कोशिश करती है और हास्यापद बनती है, द्वितीय तब, जब वह रात भर शेखर के पास रहने के बाद फिर अपने पति के घर जाती है । यदि उपन्यास की मूल दृष्टि स्पष्ट होती, उसमें एक निश्चयात्मक संवेदना होती तो शशि को वापस भेजने की आवश्यकता न पैदा होती । मगर इन दोनों स्थितियों की बावजूद शशि शेखर से महान बन जाती है क्योंकि उसका उद्देश्य स्पष्ट है, उसे अपने आप पर पूरा विश्वास है, वह दूसरों के विश्वास का पात्र बनती है मगर शेखर कभी भी विश्वास का पात्र नहीं बन पाता और शशि के मरने से पूर्व ही नए प्रणय की भूमिका तैयार कर लेता है, शशि से अनुमति भी दिलवा दी जाती है । स्वच्छंद भोग को इस प्रकार फिलास्फाइस करने की जरूरत नहीं थी । लेखक न तो मुक्त भोग को स्वीकार करता है और न ही प्रणय को मर्यादा में रखना चाहता है । शेखर प्रेम करना चाहता है, उससे अधिक प्रेम पाना चाहता है मगर प्रेम में बंधकर नहीं रहना चाहता, प्रेम में वह न बंधे यह कहने का सहस उसमें नहीं है, इसलिए उसे शशि से ही इसकी इजाजत दिलवा दी जाती है ।

कृति की सबसे अधिक शक्ति शेखर के किशोर-जीवन की ग्रंथियों के वर्णन में दिखाई देती है । इसके अतिरिक्त न तो आतंकवादी भावना की ही कोई सार्थकता दिखलाई गई है और न प्रणय की ही । अंको अपने आप में मूल्य भी नहीं माना गया । सवाल होते हैं ‘आतंकवाद क्यों? शशि की मृत्यु क्यों? इन दोनों की क्या सार्थकता है ? मगर उत्तर नहीं मिलता । क्योंकि इन्हें जिस व्यापक सन्दर्भ में सार्थक दिखाया जा सकता था यहाँ उस व्यापक सन्दर्भ का अभाव है और व्यक्तिवादी स्तर पर संवेदना के स्तर पर भी इनकी सार्थकता नहीं उभरती । इस प्रकार यह कृति एक उलझी हुई अहंवादी संवेदना की अर्थहीन फैंटेसी बन गई है ।

लोगों द्वारा पूछे गए प्रश्न
  • शेखर एक जीवनी किसकी रचना है ?
शेखर एक जीवनी ‘सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय’ का मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास है । इस उपन्यास के दो भाग हैं ।
  • शेखर एक जीवनी का रचनाकाल क्या है ?
यह उपन्यास दो भागों में विभाजित है, जिसके पहले भाग का रचनाकाल १९४१ ई० है अथवा दूसरे भाग का रचनाकाल १९४४ ई० है ।
  • शेखर एक जीवनी के कितने खंड है?
दो भाग हैं, प्रत्येक भाग चार खण्डों में विभाजित है । शेखर एक जीवनी के पहले भाग का नाम ‘उत्थान है ‘उत्थान’ है और इसका रचनाकाल 1941 ई० है । दूसरे भाग का नाम ‘उत्कर्ष’ है जिसका रचनाकाल 1944 ई० है । इस उपन्यास के प्रथम भाग के भी चार (4) खंड हैं, जिनको विभाजित किया गया है – उषा और ईश्वर, बीज और अंकुर, प्रकृति और पुरुष तथा पुरुष और परिस्थिति, इस चार खण्डों में । ऐसे ही दूसरे भाग के भी चार (4) खंड हैं, जो विभाजित हैं – पुरुष और परिस्थिति, बंधन और जिज्ञासा, शशि और शेखर तथा धागे, रस्सियाँ, गुंझर, इन चार खण्डों में ।
  • शेखर एक जीवनी किसकी आत्मकथा है ?
इस उपन्यास का नायक जो शेखर है वह स्वयं अज्ञेय हैं या कोई और व्यक्ति यह हमेशा कौतूहल का विषय रहा है, कुछ लोग मानते हैं कि, यह अज्ञेय की ही आत्मकथात्मक कृति है । लेकिन इस उपन्यास की भूमिका में अज्ञेय स्वयं कहते हैं कि, ‘आत्म-घटित ही आत्मानुभूत नहीं होता, पर-घटित भी आत्मानुभूत हो सहता है, यदि हममें सामर्थ्य है कि, हम उसके प्रति खुले रह सकें ।’ शेखर में मेरापन कुछ अधिक है लेकिन यह कथा ऐसी नहीं है कि, इसे एक आदमी की निजी बात कहा जा सके ।
  • शेखर एक जीवनी कौन सी विधा है ? – यह उपन्यास विधा है – जिसे पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) शैली में लिखा गया है ।
  • शेखर एक जीवनी के प्रथम भाग का नाम क्या है – उत्थान (१९४१)
  • शेखर एक जीवनी के दूसरे भाग का नाम क्या है ? – उत्कर्ष (१९४४)
  • शेखर एक जीवनी के नायक का नाम क्या है ? – शेखर स्वयं इस उपन्यास का नायक है ।
  • अज्ञेय जी का पूरा नाम क्या है? – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ।

शेखर एक जीवनी उपन्यास को अवश्य ही पढ़ा जाना चाहिए

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1 comment

Sonia Sharma जुलाई 11, 2022 - 4:03 पूर्वाह्न

बहुत ही महत्वपूर्ण,उपयोगी ओर पूर्ण जानकारी. ये सब आप ही कर सकते है सर. आपकी मेहनत ओर ज्ञान का साक्षात दर्शन है. देश को आपके जेसे शिक्षक की जरुरत है 🙏🙏बहुत बहुत आभार आपका 💐💐

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